24x7 इंसाफ: कागजी अधिकार बनाम व्यावहारिक न्याय! न्याय की चौखट और समय की पाबंदी !

 




"अन्याय का कोई तय वक्त नहीं होता, तो फिर अदालतें समयबद्ध क्यों हों?" यह एक ऐसा यक्ष प्रश्न है जो भारत की न्यायिक व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर खड़ा हुआ है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका (महर्षि रेद्दन बनाम भारत संघ) ने इस विमर्श को एक नया मोड़ दे दिया है। याचिका में यह बुनियादी सवाल उठाया गया है कि जब राज्य द्वारा किसी नागरिक के अधिकारों का हनन रात के अंधेरे में या छुट्टियों के दिन किया जाता है, तो न्याय पाने के लिए उसे अगली सुबह या अदालत खुलने का इंतजार क्यों करना पड़े?

भारत का संविधान हर नागरिक को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि यह अधिकार तभी तक प्रभावी दिखता है जब तक अदालतें खुली रहती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए अब सभी उच्च न्यायालयों के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने का निर्णय लिया है, ताकि कार्यालयी समय के बाद भी जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में तुरंत न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

असली मुद्दा: कहाँ चूक रही है व्यवस्था?

अदालती दीवारों के बाहर की जमीनी हकीकत यह है कि अक्सर प्रशासनिक और पुलिसिया कार्रवाइयां जानबूझकर ऐसे समय पर की जाती हैं जब पीड़ित के पास कानूनी उपचार पाने का समय ही न बचे। मुख्य रूप से चार ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ तुरंत न्यायिक हस्तक्षेप की सबसे ज्यादा जरूरत होती है:

रातों-रात और सुबह-सुबह ध्वस्तीकरण (Bulldozer Action): हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों में बिना उचित कानूनी प्रक्रिया या बिना पर्याप्त नोटिस दिए रातों-रात बुलडोजर चलाकर निर्माण ढहाने के मामले सामने आए हैं। जब तक प्रभावित परिवार अदालत पहुँचता है, तब तक नुकसान हो चुका होता है।

छुट्टियों या रात के समय गिरफ्तारियाँ: यूएपीए (UAPA), पीएमएलए (PMLA) या अन्य सख्त कानूनों के तहत अक्सर किसी व्यक्ति को शुक्रवार की रात या सप्ताहांत (Weekend) से ठीक पहले हिरासत में लिया जाता है। ऐसे में आरोपी को सोमवार या मंगलवार तक बिना किसी त्वरित न्यायिक उपचार के जेल में रहना पड़ता है।

निर्वासन और शरणार्थी कार्रवाइयां: संदिग्ध विदेशी नागरिकों या बिना दस्तावेजों वाले प्रवासियों को अक्सर तड़के या छुट्टी के दिन निर्वासित करने की कार्रवाई की जाती है, जिससे उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाने का मौका ही नहीं मिलता।

पुलिस हिरासत में मौत या हिंसा: पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों और उत्पीड़न के मामलों में परिवार को तुरंत यह पता लगाने का कोई जरिया नहीं होता कि उनका परिजन किस हाल में है।

चुनौतियाँ और व्यावहारिक रुकावटें

अदालतों को 24×7 सक्रिय करने की राह में कई ढांचागत और व्यावहारिक चुनौतियाँ हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता:

दुरुपयोग की आशंका: यदि अदालतें रात में भी खुलेंगी, तो कोई भी रसूखदार व्यक्ति रात के 11 बजे याचिका दाखिल कर यह दावा कर सकता है कि उसका मामला अत्यंत जरूरी है। वास्तविक तात्कालिकता (Urgency) की पहचान करना रजिस्ट्री के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

रजिस्ट्री और न्यायधीशों पर अतिरिक्त बोझ: भारतीय अदालतें पहले से ही मुकदमों के भारी बोझ से दबी हुई हैं। रात या छुट्टियों के दिन सेवा उपलब्ध कराने के लिए अतिरिक्त ड्यूटी जज, रजिस्ट्री स्टाफ और तकनीकी ढांचे की आवश्यकता होगी।

उच्च न्यायालयों की विविधता: भारत में 25 उच्च न्यायालय हैं, और हर एक की अपनी परंपरा, नियम और कार्यक्षमता है। सॉलिसिटर जनरल के अनुसार, सभी के लिए एक समान SOP बनाना एक जटिल कार्य है, इसलिए हर हाई कोर्ट को अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार मानक संचालन प्रक्रिया बनाने की छूट दी जानी चाहिए।

डिजिटल असमानता: हालांकि ई-फाइलिंग (e-Filing) और वर्चुअल सुनवाई से न्याय तक पहुँच आसान हुई है, लेकिन देश के दूरदराज के इलाकों में आज भी इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता की भारी कमी है। यह व्यवस्था एक आम ग्रामीण या गरीब नागरिक की तुलना में शहरी और संपन्न वर्ग के लिए अधिक सुलभ हो सकती है।

Comments

Popular posts from this blog

अलविदा! एक जन-नेता का सफर हुआ पूरा: प्रोफेसर वसीमुल हक़ 'मुन्ना नेता' नहीं रहे !

80 करोड़ की संपत्ति के मालिक पद्मश्री का वृद्धाश्रम में हुआ देहांत, बेटे-बेटी ने मुंह मोड़ा !😢😢

बिहार मतदाता पुनरीक्षण स्थिति रिपोर्ट: एक गहन विश्लेषण !-प्रो प्रसिद्ध कुमार , अर्थशास्त्र विभाग Rlsy college, Anisabad , Patna.