पक्षी की बातें: जेब्रा फिंच पर शोध के लिए वैज्ञानिक को मिला ₹95 लाख का पुरस्कार !
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले की वैज्ञानिक डॉ. जूली एली (Dr. Julie Elie) को जेब्रा फिंच पक्षियों के आपसी संवाद पर शोध के लिए प्रतिष्ठित 'कॉलर डोलिटल चैलेंज' द्वारा $100,000 (लगभग ₹95 लाख) का पुरस्कार दिया गया है। उन्होंने जेब्रा फिंच द्वारा की जाने वाली 11 विशिष्ट कॉल्स (आवाजों) और उनके अर्थों की पहचान की है।
पहले वैज्ञानिक केवल आवाजों के ध्वनिक ढांचे का अध्ययन करते थे। डॉ. एली के शोध में यह नई बात सामने आई कि ये पक्षी आवाजों को केवल उनकी ध्वनि के आधार पर नहीं, बल्कि उनके 'अर्थ' और व्यावहारिक उपयोग के आधार पर वर्गीकृत करते हैं।
पशु संज्ञान शोधकर्ता डॉ. एंटोनियो जोस ओसुना-मस्कारो के अनुसार, जब पक्षी आवाज पहचानने में गलती करते हैं, तो वे उन आवाजों के बीच अधिक भ्रमित होते हैं जिनका अर्थ एक जैसा होता है, न कि उन आवाजों में जिनकी केवल ध्वनि आपस में मिलती-जुलती हो। इससे यह साबित होता है कि उनका दिमाग आवाजों के पीछे के व्यावहारिक अर्थ को समझता है।
आज के समय में एआई (AI) लाखों आवाजों के डेटा का विश्लेषण करके बारीक पैटर्न ढूंढ सकता है। लेकिन इसके साथ एक बड़ा जोखिम 'एंथ्रोपोमोर्फिज्म' का है—यानी जानवरों की आवाजों को जबरन इंसानी शब्दों या व्याकरण से जोड़ने की मानवीय भूल। एआई द्वारा खोजी गई श्रेणियां केवल पक्षी की पहचान, लिंग या उसकी घबराहट को दर्शा सकती हैं, जरूरी नहीं कि वे इंसानी भाषा जैसे शब्द हों।
सच्चे संवाद का अर्थ है कि जानकारी दोनों तरफ से बहे। वैज्ञानिकों का मानना है कि हमें जानवरों को जबरन अपनी इंसानी भाषा के सांचे में ढालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनके प्राकृतिक परिवेश और उनकी अपनी संवाद प्रणाली का सम्मान करते हुए उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए।

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