अज्ञान का सत्ता-केंद्र: - पत्रकार अशोक बाजपेयी !


   


​"आज अज्ञान देहरादून की गलियों से, चांदनी चौक से नहीं, लालकिले से चढ़कर बोल रहा है।"

​इस कथन में बाजपेयी ने 'अज्ञान' के भौगोलिक और राजनीतिक विस्थापन को रेखांकित किया है। 

पारंपरिक रूप से अज्ञान को एक व्यक्तिगत या अनपढ़ होने की स्थिति के रूप में देखा जाता था (जैसे गलियों या सामान्य बाजारों में)। बाजपेयी तर्क देते हैं कि अब अज्ञान केवल आम जनता के बीच सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्ता के शीर्ष केंद्रों (लालकिले/संसद) से प्रसारित हो रहा है।

​देहरादून/चांदनी चौक: ये स्थान जन-साधारण, सामान्य जीवन या पुराने बौद्धिक केंद्रों के प्रतीक हैं। लेखक का कहना है कि अज्ञान अब यहाँ से नहीं फैल रहा।

​लालकिला: यह भारतीय सत्ता, नीति-निर्माण और राष्ट्र के सर्वोच्च नेतृत्व का प्रतीक है। जब सत्ता के गलियारों से अविवेकपूर्ण, तथ्यात्मक रूप से गलत या तर्कहीन बातें कही जाती हैं, तो वह 'अज्ञान' राष्ट्र-नीति का हिस्सा बन जाता है।

यह कथन सत्ता द्वारा बौद्धिकता की अनदेखी और तर्कहीनता को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति पर कटाक्ष है। जब शासक वर्ग या संस्थान तथ्यों के बजाय पूर्वाग्रहों और अल्पज्ञान से संचालित होते हैं, तो वह अज्ञान पूरे देश पर भारी पड़ता है।

 हरिशंकर परसाई 

​"आज के दौर में सत्ता को बुद्धिमानों से ज्यादा उन लोगों की जरूरत है जो तर्क करना भूल गए हैं।"


​2. जॉर्ज ऑरवेल 

​"अज्ञान ही शक्ति है।" (Ignorance is Strength )

​3. रामधारी सिंह 'दिनकर' 

​"जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।"

 सत्ता, अज्ञान और समाज का संकट


किसी भी जीवंत लोकतंत्र की धुरी उसकी 'तार्किक क्षमता' होती है। जब देश की दिशा तय करने वाले केंद्र (जैसे लालकिला) स्वयं अज्ञान का आश्रय ले लेते हैं, तो यह केवल एक राजनीतिक चूक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक त्रासदी है।

 जब आधिकारिक मंचों से असत्यापित सूचनाएं या तर्कहीन दावे किए जाते हैं, तो वे समाज के लिए 'मानक' बन जाते हैं। अज्ञान अब निजी न रहकर सार्वजनिक नीति बन जाता है।

बाजपेयी का यह कथन इस ओर भी इशारा करता है कि समाज में बुद्धिजीवी वर्ग की उपेक्षा की जा रही है और सत्ता उन लोगों को महत्व दे रही है जो यथास्थिति के प्रति सवाल नहीं उठाते।

अशोक बाजपेयी का यह कथन हमें आत्म-चिंतन के लिए प्रेरित करता है। हमें यह परखने की आवश्यकता है कि क्या हम अपनी राय तथ्यों पर आधारित बना रहे हैं या उस 'अज्ञान' को ग्रहण कर रहे हैं जो सत्ता के शीर्ष से निरंतर प्रसारित किया जा रहा है। एक सजग नागरिक का धर्म ही उस अज्ञान के विरुद्ध तर्क का दीपक जलाना है।

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