मृत्युभोज: आस्था के नाम पर सामाजिक अभिशाप और हमारी संवेदनहीनता !
शोक के आंगन में स्वाद की तलाश क्यों?
किसी प्रियजन के चले जाने का दुख क्या होता है, यह केवल वही परिवार समझ सकता है जिसने अपना कोई खोया है। मृत्यु के बाद घर में पसरा सन्नाटा, अपनों के आंसू और वो कभी न भरने वाला खालीपन... ऐसे गमगीन माहौल में जब पूरा समाज उस पीड़ित परिवार के घर 'मृत्युभोज' (तेरहवीं) के नाम पर पकवान खाने जुटता है, तो मानवता सचमुच शर्मसार हो जाती है। जिस चौखट पर बैठकर कभी ढांढस बंधाना चाहिए था, वहां बैठकर भोजन की फरमाइश करना हमारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
शास्त्रों का सच्चा संदेश: पुण्य नहीं, यह पाप है
हम अक्सर परंपराओं की दुहाई देकर अपनी गलतियों को छुपाने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमारे ग्रंथ और इतिहास कुछ और ही सीख देते हैं।
महाभारत का अनुशासन पर्व: महाभारत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि विपदा और संकट के समय पीड़ित परिवार की तन, मन और धन से सहायता करनी चाहिए, न कि उनके घर जाकर भोजन ग्रहण करना चाहिए।
श्रीकृष्ण का उपदेश: भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, भोजन हमेशा प्रसन्न मन की स्थिति में ही ग्रहण करना चाहिए। शोक संतप्त मन से बनाया और खिलाया गया भोजन कभी तृप्ति नहीं दे सकता।
गरुड़ पुराण की सीख: गरुड़ पुराण में भी मृत्युभोज को पूरी तरह वर्जित माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, किसी के गहरे दुख के समय कराया जाने वाला यह जबरन का भोज पुण्य नहीं, बल्कि पाप का भागीदार बनाता है।
कर्ज के दलदल में सिसकते गरीब परिवार
यह कुरीति केवल धार्मिक रूप से ही गलत नहीं है, बल्कि इसने हमारे समाज के ताने-बाने को आर्थिक रूप से भी खोखला कर दिया है। एक गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार, जो पहले से ही अपने परिजन की बीमारी या इलाज के खर्च से टूट चुका होता है, उस पर समाज 'लोक-लाज' और 'दिखावे' का भारी दबाव बनाता है। समाज में नाक बचाने के लिए लोग जमीन गिरवी रखते हैं, ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेते हैं और जिंदगी भर उस बोझ तले सिसकते रहते हैं। क्या किसी की आत्मा की शांति दूसरों को कर्जदार बनाकर हासिल की जा सकती है?
वक्त आ गया है सुधार का: आइए संकल्प लें!
यदि हम सचमुच एक सभ्य और संवेदनशील समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें इस कुप्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। समाज कल्याण और मानवता के हित में निम्नलिखित कदम उठाना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है:
बहिष्कार की शुरुआत खुद से करें: संकल्प लें कि हम किसी भी मृत्युभोज में शामिल नहीं होंगे और न ही भोजन ग्रहण करेंगे।
दिखावे और लोक-लाज का डर छोड़ें: यदि हमारे घर में ऐसी कोई दुखद घटना होती है, तो समाज के दबाव में आकर कोई बड़ा आयोजन न करें।
धन का सही सदुपयोग: भोज पर लाखों रुपये बर्बाद करने के बजाय, उस राशि को किसी अनाथालय, वृद्धश्रम, गरीब बच्चों की शिक्षा या किसी अस्पताल में दान करें, ताकि दिवंगत आत्मा को सच्ची शांति और दुआएं मिल सकें।

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