राम मंदिर के बाद अब 'शिक्षा के मंदिर' में भी डाका? नीति नहीं, नीयत देखिए!
महिला कॉलेज, खगौल की प्रभारी प्राचार्या और भाजपा की पूर्व विधायक डॉ. उषा विद्यार्थी पर आरोप।
समाज में जब आस्था के केंद्रों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, तब अक्सर नैतिकता के ऊंचे मापदंडों का दावा किया जाता है। लेकिन जब वही रक्षक भक्षक बन जाएं और 'शिक्षा के मंदिर' को अपनी जागीर समझकर लूट का अड्डा बना लें, तो व्यवस्था और राजनीति दोनों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना द्वारा महिला कॉलेज, खगोल की प्रभारी प्राचार्या और भाजपा की पूर्व विधायक डॉ. उषा विद्यार्थी को जारी किया गया 'कारण बताओ नोटिस' इसी कड़वी सच्चाई को बयां करता है।
यह केवल एक प्रशासनिक नोटिस नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की आत्मा पर हुआ वो प्रहार है जो चीख-चीख कर कह रहा है—"लूट और भ्रष्टाचार की बुनियाद पर कोई भी शिक्षण संस्थान कभी फल-फूल नहीं सकता।"
भ्रष्टाचार का 'अकादमिक मॉडल': आरोपों का कच्चा चिट्ठा
जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाएं, तो नियम-कानून कागजों की शोभा बनकर रह जाते हैं। इस मामले में जो १० संगीन आरोप सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील नागरिक को झकझोरने के लिए काफी हैं:
बिना पद के लाखों का भुगतान: बर्सर (Burser) का पद खाली होने के बावजूद मून लाइट इन्फोटेक, अमृत एंटरप्राइजेज और रिद्धि सिद्धि एंटरप्राइजेज जैसी फर्मों को ₹22 लाख से अधिक का अवैध भुगतान कर दिया गया।
फर्जी और जाली हस्ताक्षर: सरकारी और संस्थागत निधियों को निकालने के लिए जाली हस्ताक्षरों (Forgery) का सहारा लिया गया, जो सीधे तौर पर भारतीय दंड संहिता के तहत एक गंभीर और दंडनीय अपराध है।
नियमों को ताक पर रखना: विकास समिति की बिना किसी बैठक या स्वीकृति के और बिना कोई कोटेशन प्राप्त किए चहेती कंपनियों (जैसे अमन इन्फोटेक) को ₹10 लाख का भुगतान उड़ा दिया गया।
संदेहास्पद और अवैध नियुक्तियां: कथित रूप से फर्जी आउटसोर्सिंग कर्मियों के नाम पर हर महीने भारी-भरकम राशि निकाली गई। यानी जो कर्मचारी जमीन पर थे ही नहीं, उनके नाम पर संस्थान की तिजोरी खाली की जाती रही।
शिक्षकों और फंडों का दुरुपयोग: 'टीचर फंड' और 'जनरल फंड' जिसका उपयोग छात्राओं और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए होना चाहिए था, उसका अनुचित और अनधिकृत इस्तेमाल किया गया। यहाँ तक कि अकाउंटेंट के बिना हस्ताक्षर और अनुमोदन के ही वित्तीय लेन-देन कर दिए गए।
नीति नहीं, नीयत का असली खेल!
चुनावी मंचों से बड़ी-बड़ी नीतियां घोषित की जाती हैं। 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और 'पारदर्शी शासन' जैसे नारे दिए जाते हैं। लेकिन जब एक महिला कॉलेज में ही बेटियों के भविष्य और संसाधनों पर इस तरह डाका डाला जाता है, तो साफ हो जाता है कि सरकार या नेताओं की नीति चाहे जो हो, उनकी नीयत पूरी तरह खोट से भरी है।
राजनीतिक रसूख और पूर्व विधायक होने का घमंड जब शिक्षा के पावन परिसर पर हावी हो जाता है, तो नुकसान सिर्फ पैसों का नहीं होता; बल्कि उस भरोसे का होता है जो हजारों माता-पिता अपनी बेटियों को कॉलेज भेजते समय संजोते हैं।
बड़ा सवाल: क्या राजनीतिक रसूख रखने वाले इन सफेदपोशों के लिए नियम-कायदे मायने नहीं रखते? क्या सत्ता का संरक्षण इन्हें इस बात की छूट देता है कि ये ज्ञान के मंदिर को अपनी व्यक्तिगत कमाई का जरिया बना लें?

Comments
Post a Comment