जड़ों से उखड़ती ज़िंदगी: जलवायु परिवर्तन का अनकहा दर्द!

  


​आज जब हम विकास की ऊँचाइयों को छूने की बात करते हैं, तो कहीं न कहीं हम उस ज़मीन को खोते जा रहे हैं जो हमें पालती-पोसती है। वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन अब केवल तापमान के बढ़ने या ग्लेशियरों के पिघलने की वैज्ञानिक चर्चा नहीं रह गई है, बल्कि यह करोड़ों लोगों की आँखों से बहते आँसू और उनकी आँखों में छिपे डर की कहानी बन चुकी है।

भारत सहित दुनिया के तमाम हिस्सों में एक बड़ा जनमानस अब इस दुविधा में नहीं है कि मौसम कब बदलेगा। उनका प्रश्न अस्तित्व का है—क्या आने वाले वर्षों में वे अपने पुरखों की ज़मीन, अपने खेत और अपने घर की दहलीज पर टिक पाएंगे? बाढ़ का पानी, समुद्र का बढ़ता दायरा, खेतों में दरारें डालता सूखा और तूफानी चक्रवात—ये केवल आपदाएं नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उन लोगों को उनकी जड़ों से उखाड़ने वाले क्रूर प्रहार हैं।

समाज में अक्सर विस्थापन को केवल एक 'सरकारी आंकड़े' या 'पुनर्वास' की समस्या के रूप में देखा जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि जब कोई परिवार अपना घर छोड़ता है, तो वह केवल ईंट-पत्थर का एक ढांचा नहीं खोता। उसके साथ वे अनमोल स्मृतियाँ खो जाती हैं जो बचपन की गलियों में बसी थीं; वे सामाजिक संबंध और ताने-बाने टूट जाते हैं जो संकट में ढाल बनते थे; वह सांस्कृतिक पहचान धूमिल हो जाती है जो उनकी विरासत थी।

​सबसे दुखद यह है कि इस प्रक्रिया में व्यक्ति अपने 'भविष्य का भरोसा' भी खो देता है। एक अनिश्चित कल की ओर कदम बढ़ाते हुए, वे न केवल बेघर होते हैं, बल्कि अपनी जड़ों से कटकर एक ऐसी गुमनामी में चले जाते हैं जहाँ से वापसी का रास्ता शायद कभी नहीं मिलता।

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