वैश्विक शिक्षा हब बनने की राह में भारत: सस्ती पढ़ाई, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय छात्रों का अभाव।

 

दिल्ली दुनिया का सबसे सस्ता छात्र शहर ! 



क्वाक्वेरेली साइमंड्स (QS) बेस्ट स्टूडेंट सिटीज 2027 की नवीनतम रैंकिंग में भारतीय उच्च शिक्षा परिदृश्य की मजबूतियों और चुनौतियों का एक स्पष्ट खाका सामने आया है। एक तरफ जहाँ भारत के प्रमुख शहर वैश्विक स्तर पर पढ़ाई के लिहाज से बेहद किफायती और रोजगार योग्य स्नातकों के निर्माण में आगे हैं, वहीं अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित करने के मामले में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।


QS रैंकिंग के अनुसार, दिल्ली को दुनिया में छात्रों के लिए सबसे किफायती (Affordable) शहर चुना गया है, जहाँ अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के लिए औसत शिक्षण शुल्क लगभग $2,700 प्रति वर्ष है। समग्र रैंकिंग में दिल्ली 5 पायदान की छलांग लगाकर 99वें स्थान पर पहुँच गई है।

अन्य भारतीय शहरों में:

मुंबई: भारत का सबसे शीर्ष स्थान प्राप्त शहर बनकर उभरा है, जो 7 पायदान चढ़कर 91वें स्थान पर पहुँच गया है (किफायती मामले में 12वाँ स्थान)।

बेंगलुरु: 6 पायदान फिसलकर संयुक्त रूप से 114वें स्थान पर आ गया है। यहाँ औसत अंतर्राष्ट्रीय शिक्षण शुल्क लगभग $5,400 प्रति वर्ष (चारों शहरों में सबसे अधिक) दर्ज किया गया।

चेन्नई: 5 पायदान सुधरकर 123वें स्थान पर पहुँचा है।

रोजगार क्षमता में मजबूती, लेकिन 'स्टूडेंट मिक्स' में गिरावट

भारतीय स्नातकों की गुणवत्ता और उद्योग जगत में उनकी मांग का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली और मुंबई नियोक्ता गतिविधि (Employer Activity) में दुनिया के शीर्ष 35 शहरों में शामिल हैं—दिल्ली 29वें और मुंबई 34वें स्थान पर है।

हालाँकि, अंतर्राष्ट्रीय विविधता और छात्रों के अनुपात को मापने वाले 'स्टूडेंट मिक्स' (Student Mix) पैमाने पर सभी भारतीय शहरों का प्रदर्शन काफी कमज़ोर रहा:

150 शहरों की सूची में दिल्ली 146वें स्थान पर रही।

मुंबई इस पैमाने पर सबसे निचले स्थान पर रहा।

चारों भारतीय शहर इस श्रेणी में 145वें से 150वें स्थान के बीच रहे।

अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा में संरचनात्मक असंतुलन

QS की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) जेसिका टर्नर के अनुसार, भारत में दुनिया का सबसे किफायती उच्च शिक्षा तंत्र है और यहाँ के विश्वविद्यालय तेज़ी से विकसित हो रहे हैं, लेकिन "पहुंच और वैश्विक प्रसार" (Reach) अभी भी सबसे बड़ी चुनौती है।

एक नज़र आंकड़ों पर:

13 लाख से अधिक भारतीय छात्र वर्तमान में विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं।

जबकि भारत में केवल ~50,000 अंतर्राष्ट्रीय छात्र ही पढ़ाई के लिए आते हैं (जिनमें से लगभग एक-तिहाई छात्र अकेले नेपाल से हैं)।

सुधार के प्रयास और भविष्य की राह

इस असंतुलन को दूर करने के लिए भारत सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और 'स्टडी इन इंडिया' (Study in India) कार्यक्रम के तहत दक्षिण एशिया, अफ्रीका, खाड़ी देशों और मध्य एशिया के छात्रों को आकर्षित करने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।

वैश्विक शिक्षा परिदृश्य में भारत का उच्च शिक्षा तंत्र तेज़ी से विस्तार कर रहा है—2017 में QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में जहाँ भारत की 14 यूनिवर्सिटीज थीं, वहीं 2027 की रैंकिंग में यह संख्या तीन गुना बढ़कर 52 हो गई है, जो इसे पिछले एक दशक में G20 देशों में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला शिक्षा तंत्र बनाती है। भारत को सच्चा 'ग्लोबल एजुकेशन हब' बनाने के लिए गुणवत्ता सुधार, अधिक खुलेपन और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

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