लोकतांत्रिक संकट और न्यायिक जवाबदेही: सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पर सवाल !

   


यह चुनावी प्रक्रिया में मतदाताओं को बाहर किए जाने की समस्या और उसके प्रति सर्वोच्च न्यायालय के उदासीन व सुस्त रवैये की गंभीर समीक्षा  है।

मतदान के अधिकार का क्षरण: चुनाव आयोग द्वारा लागू की गई 'विशेष गहन समीक्षा' (SIR) प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है। इसने गरीब, निरक्षर और प्रवासी मजदूरों जैसे हाशिए के नागरिकों के लिए मतदाता सूची में नाम बनाए रखना बेहद कठिन बना दिया है, जिसे विद्वान 'डिजिटल संरचनात्मक तानाशाही' भी कह रहे हैं।

न्यायालय का विलंबित हस्तक्षेप: न्यायालय कार्यपालिका या चुनाव आयोग के निर्णयों को समय रहते चुनौती देने में विफल रहा है। बिहार के 'SIR' मामले में अदालत का फैसला तब आया जब चुनाव समाप्त हो चुके थे, जिससे यह निर्णय केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया।

न्यायिक समीक्षा बनाम प्रशासनिक पक्षपात: न्यायालय ने इस प्रक्रिया में निष्पक्ष न्यायिक समीक्षा करने के बजाय खुद को प्रशासनिक समन्वय में शामिल कर लिया, जिससे लाखों मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया को बल मिला। अदालत ने जमीनी सामाजिक वास्तविकताओं (जैसे गरीबी और निरक्षरता) की पूरी तरह अनदेखी की।

संस्थागत निष्पक्षता पर संकट: वर्तमान में लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता खतरे में है। ऐसे में न्यायिक निर्णयों को सरकार की नीतियों को वैचारिक वैधता देने का उपकरण बनने से रोकना बेहद जरूरी हो गया है।

लोकतांत्रिक विसंगतियों को केवल न्यायिक प्रक्रियाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। भारतीय लोकतंत्र को बचाने के लिए राजनीतिक विपक्ष और आम जनता को पारंपरिक कानूनी लड़ाइयों से आगे बढ़कर जमीनी जन-आंदोलनों और नागरिक सक्रियता का मार्ग अपनाना होगा।

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