विवेकपूर्ण ढंग से भूलना कैसे याद रखें?
डिजिटल युग में जहां हर जानकारी हमेशा के लिए इंटरनेट पर दर्ज हो जाती है, व्यक्ति के सम्मान और निजता की रक्षा करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस दिशा में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारत में 'भूल जाने का अधिकार' (Right to be Forgotten) के न्यायशास्त्र को आकार देते हुए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए निजता के अधिकार से निकलता है।
अदालत के इस फैसले का मुख्य उद्देश्य न्यायिक रिकॉर्ड को डी-इंडेक्स करना और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध अदालती दस्तावेजों से व्यक्तिगत पहचान को छिपाना है। इंटरनेट पर डिजिटल रिकॉर्ड की स्थायी उपलब्धता किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को जीवनभर के लिए नुकसान पहुंचा सकती है, भले ही वह मामला सुलझ गया हो या वह बरी हो चुका हो।
हालांकि, यह अधिकार असीमित या निरपेक्ष नहीं है:
अपवाद: महिलाओं या बच्चों के खिलाफ हुए अपराधों, जन-विश्वास के उल्लंघन या उन मामलों में यह राहत नहीं मिलेगी जहाँ सार्वजनिक हित व्यक्तिगत निजता से अधिक महत्वपूर्ण हो।
इतिहास से छेड़छाड़ नहीं: यह अधिकार इतिहास को फिर से लिखने या सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी को छिपाने का जरिया नहीं बन सकता।
तेजी से बढ़ते डिजिटलीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के दौर में व्यक्तिगत जानकारी को बड़े पैमाने पर कॉपी, इंडेक्स और विश्लेषित किया जा सकता है। ऐसे में सबसे बड़ा और कठिन सवाल यह उठता है कि: 'वैध सार्वजनिक हित' क्या है और इसे तय करने के मानक क्या होंगे?
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है:
यूरोपीय संघ (EU): GDPR के तहत 'भूल जाने के अधिकार' को मान्यता देता है।
ब्रिटेन: वहां की अदालतों ने निजता और जनहित के बीच संतुलन बनाते हुए सर्च इंजनों के खिलाफ डी-लिस्टिंग अधिकारों को स्वीकार किया है।
आज जब एआई (AI) और डेटा प्रोसेसिंग तकनीक अप्रत्याशित गति से बढ़ रही हैं, तब भारत सरकार को हितधारकों के साथ विचार-विमर्श करके सार्वजनिक जानकारी को हटाने और डी-इंडेक्स करने के स्पष्ट मानक तय करने चाहिए।
भारत में 'भूल जाने के अधिकार' के ढांचे की सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि यह अधिकार मौजूद है या नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि इसकी सीमाओं और मानकों को कितनी सावधानी व विवेक से परिभाषित किया जाता है।

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