राज्य-स्तरीय जाति सर्वेक्षण का औचित्य: एक नीतिगत आवश्यकता।

   


प्रशासनिक डेटा के एकीकरण और सामाजिक न्याय को लक्षित करने का व्यावहारिक मार्ग। 


आगामी जनगणना के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत गणना जटिल और केंद्र-राज्य के मध्य परिभाषाओं के विवादों को जन्म दे सकती है। लेखकों के अनुसार, राष्ट्रीय जनगणना की तुलना में राज्य सरकारें जाति सर्वेक्षण आयोजित करने के लिए कहीं अधिक उपयुक्त हैं।

किसी भी प्रभावी राज्य-स्तरीय सर्वेक्षण को इन पाँच बुनियादी प्रश्नों का उत्तर खोजना चाहिए:

राज्य की कुल आबादी में संबंधित जाति का आनुपातिक प्रतिशत क्या है?

उस जाति का भौगोलिक वितरण राज्य में कैसा है?

शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन का वास्तविक और मापने योग्य पैमाना क्या है?

सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी नौकरियों में उनका आनुपातिक प्रतिनिधित्व कितना है?

उच्च सरकारी व सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में उनकी भागीदारी की वर्तमान स्थिति क्या है?

 राज्यों के पास पहले से ही ई-सेवा केंद्रों, जाति प्रमाण पत्रों, राशन कार्ड, आधार लिंकेज और विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं के माध्यम से विशाल डिजिटल डेटा उपलब्ध है। तमिलनाडु सरकार द्वारा घोषित किया गया 'सामाजिक न्याय सर्वेक्षण' इस बात का आदर्श उदाहरण है कि कैसे इन आंकड़ों को एकीकृत करके बिना भारी बजटीय खर्च के सटीक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

राज्यों द्वारा किए जाने वाले स्वतंत्र जाति सर्वेक्षण आरक्षण नीतियों को अधिक न्यायसंगत और वैज्ञानिक आधार प्रदान करेंगे, जिससे अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक कल्याणकारी योजनाओं का सटीक लाभ पहुँच सके।

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