सवालों के घेरे में व्यवस्था: युवाओं का आक्रोश, संसद का ठहराव और संवाद की आवश्यकता!

 




  सरकार लोकतांत्रिक गरिमा का परिचय दे। 

देश में प्रवेश परीक्षाओं की प्रणाली में सुधार और जवाबदेही तय करने की माँग को लेकर युवाओं का आक्रोश अब केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संसद के गलियारों तक पहुँच चुका है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर लगातार जारी प्रदर्शन और संसद के दोनों सदनों में हो रहे हंगामे ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

विरोध, बल-प्रयोग और संवैधानिक अधिकार

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगों और असंतोष को व्यक्त करने का अधिकार देता है। NEET जैसी महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं में गड़बड़ियों के विरोध में युवाओं तथा विभिन्न संगठनों (जैसे काजपा) द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की माँग की जा रही है।

हालाँकि, स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब अनशन पर बैठे जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा अस्पताल में भर्ती कराया गया और प्रदर्शनकारियों के संसद मार्च के दौरान बल-प्रयोग हुआ। बल-प्रयोग के चलते कई स्थानों पर हिंसक झड़पें भी देखने को मिलीं। यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या युवाओं से संवाद स्थापित करने के बजाय बल-प्रयोग ही एकमात्र विकल्प था? यदि समय रहते बातचीत के जरिए समाधान निकाला जाता, तो संसद मार्च जैसी स्थिति को टटोला जा सकता था।

आम जनता पर असर और प्रशासनिक उपाय

आंदोलन को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सुरक्षा कारणों का हवाला देकर दिल्ली मेट्रो के 17 स्टेशनों को बंद कर दिया गया। लेकिन इस प्रशासनिक कदम का खामियाजा आम यात्रियों को भुगतना पड़ा, जिन्हें मार्ग बदलने और भारी असुविधाओं का सामना करना पड़ा। यह दर्शाता है कि केवल कड़े प्रतिबंधों और आवाजाही रोकने की तरकीबों से समस्याओं का स्थाई समाधान संभव नहीं है।

संसद की भूमिका और संवाद का रास्ता

संसद का मूल उद्देश्य जनहित के विषयों पर गंभीर मंथन कर ठोस नीतियां बनाना है। परंतु, इस मुद्दे पर गतिरोध के कारण संसद का कीमती समय और कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। विपक्ष जहाँ प्रदर्शनकारियों के समर्थन में है, वहीं सत्तापक्ष और विपक्ष—दोनों की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे प्राथमिकता के आधार पर जंतर-मंतर पर डटे युवाओं की समस्याओं पर विचार करें।

युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को दरकिनार कर या उनके आंदोलन को दबाकर समाधान नहीं निकाला जा सकता। सरकार और शासन-प्रशासन को चाहिए कि वे दमनकारी रुख अपनाने के बजाय लोकतांत्रिक गरिमा का परिचय दें और युवाओं के साथ प्रत्यक्ष संवाद कायम कर परीक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधारों की दिशा में ठोस कदम उठाएं।

Comments

Popular posts from this blog

अलविदा! एक जन-नेता का सफर हुआ पूरा: प्रोफेसर वसीमुल हक़ 'मुन्ना नेता' नहीं रहे !

80 करोड़ की संपत्ति के मालिक पद्मश्री का वृद्धाश्रम में हुआ देहांत, बेटे-बेटी ने मुंह मोड़ा !😢😢

बिहार मतदाता पुनरीक्षण स्थिति रिपोर्ट: एक गहन विश्लेषण !-प्रो प्रसिद्ध कुमार , अर्थशास्त्र विभाग Rlsy college, Anisabad , Patna.