जंतर-मंतर प्रदर्शन: पुलिस बर्बरता, कानूनी सीमाएं और जवाबदेही का सवाल !
भगवाधारियों का असली चेहरा सामने आया! बिहार के एक मंत्री को छात्रों को आतंकी कहने में भी शर्म नहीं आई
।
हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर विभिन्न परीक्षाओं में बार-बार हो रहे 'पेपर लीक' के खिलाफ छात्र, युवा और आम नागरिक (महिलाएं, किशोर व परिवार) शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। इस दौरान दिल्ली पुलिस और कुछ अज्ञात लोगों द्वारा किए गए अत्यधिक बल प्रयोग ने भीड़ नियंत्रण के सभी स्थापित प्रोटोकॉल और नियमों का उल्लंघन किया है। सोशल मीडिया पर आए कई वीडियो क्लिप पुलिस की बर्बरता और मनमानी को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
हिंसा और दुर्व्यवहार के मुख्य साक्ष्य
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो फुटेज के अनुसार:
हिंसा और उत्पीड़न: वर्दीधारी तथा सादे कपड़ों में मौजूद कर्मियों द्वारा प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के बजाय उन्हें भयभीत करने और नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से हिंसा की गई।
महिलाओं से अभद्रता: वीडियो में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा प्रदर्शनकारी छात्रा को थप्पड़ मारते, पीछे से अनधिकृत व्यक्ति द्वारा छेड़खानी करते तथा कुछ कर्मियों द्वारा घेराबंदी कर अभद्र व्यवहार व छेड़छाड़ करते देखा गया।
अज्ञात तत्वों की भूमिका: हेलमेट पहने कुछ गैर-वर्दीधारी लोग कील लगे डंडों से प्रदर्शनकारियों को पीटते और वाहनों में तोड़फोड़ करते दिखाई दिए।
गंभीर चोटें: कई प्रदर्शनकारियों को पेलेट जैसी गंभीर चोटें आई हैं, जिनका स्पष्टीकरण पुलिस या प्रशासन की ओर से अब तक नहीं दिया गया है।
पुलिस कार्रवाई का पिछला ढर्रा
यह घटना किसी एक अकेली घटना के रूप में नहीं, बल्कि पुलिस कार्रवाई के एक पुराने ढर्रे के रूप में देखी जा रही है:
2019: सीएए (CAA) विरोध प्रदर्शनों के दौरान जामिया मिलिया इस्लामिया की लाइब्रेरी में घुसकर छात्रों पर बल प्रयोग किया गया।
2020: जेएनयू परिसर में घुसे नकाबपोशों द्वारा छात्रों पर हमला किया गया, जबकि पुलिस मूकदर्शक बनी रही।
उच्चतम न्यायालय का रुख और निष्पक्ष जांच की मांग
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस की ज्यादतियों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त की है। प्रधान न्यायाधीश (CJI) ने स्पष्ट किया है कि न्यायालय न्याय की गुहार लगाने वालों के लिए सदैव खुला है।
प्रमुख मांगें व आवश्यकताएं:
पारदर्शी जांच: एक स्वतंत्र और गहन जांच के माध्यम से यह पता लगाया जाए कि क्या बल प्रयोग अधिकृत और आनुपातिक था।
जवाबदेही: हिंसा, तोड़फोड़ और विशेष रूप से महिलाओं व बच्चों के साथ हुए यौन उत्पीड़न व दुर्व्यवहार के दोषियों—चाहे वे पुलिसकर्मी हों या घुसे हुए अराजक तत्व—को चिह्नित कर कानून के तहत सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए।

Comments
Post a Comment