बेशर्म सरकार! लोकतंत्र पर प्रहार: हक मांगते युवाओं पर लाठियां और तानाशाही का उदय! - प्रो प्रसिद्ध कुमार।

   



बहुत ही भारी मन से, मर्माहत होकर इस पोस्ट को लिख रहा हूँ। इसे पढ़कर आपको अगर पीड़ा नहीं होता है तो फिर क्या कहें!.. 

लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में सरकार संवाद के बजाय दमन का रास्ता चुन रही है। नीट (NEET) जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में लगातार होते पेपर लीक ने देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य को अधर में लटका दिया है। जब यही पीड़ित युवा अपने अधिकारों की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर लोकतांत्रिक तरीके से इकट्ठा हुए, तो सरकार ने उनसे बात करने के बजाय पुलिसिया बर्बरता का सहारा लिया। शांत मन से अपनी बात कह रहे छात्रों पर लाठियां बरसाना और आंसू गैस के गोले छोड़ना बेहद निंदनीय और शर्मनाक है। यह कार्रवाई स्पष्ट करती है कि सत्ता अब जनसरोकारों के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील हो चुकी है।

संवाद का अंत और लाठीशाही का राज

किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की पहली शर्त होती है—जनता और सरकार के बीच निरंतर संवाद। शिक्षा मंत्री से जवाब मांगने आए छात्रों को अपराधियों की तरह खदेड़ना इस बात का प्रमाण है कि सरकार अपनी कमियों को छिपाने के लिए बल प्रयोग कर रही है। जब देश की रीढ़ कहे जाने वाले युवा ही सुरक्षित नहीं हैं और उनकी आवाज को डंडे के दम पर दबाया जा रहा है, तो ऐसी व्यवस्था को लोकतांत्रिक कहना लोकतंत्र शब्द का अपमान है।

पेपर लीक माफिया को संरक्षण और युवाओं से विश्वासघात

नीट जैसी बड़ी परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक होना सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार को उजागर करता है। सरकार इस माफिया तंत्र पर नकेल कसने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। अपनी नाकामी को छिपाने के लिए वह उन युवाओं को निशाना बना रही है जिन्होंने रात-दिन मेहनत कर परीक्षा की तैयारी की थी। यह रवैया युवाओं के सपनों की सरेआम हत्या करने जैसा है।

भय का माहौल और तानाशाही की आहट

जंतर-मंतर पर की गई बर्बर कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य युवाओं के मन में खौफ पैदा करना है ताकि भविष्य में कोई भी सरकार की नीतियों या विफलताओं पर सवाल उठाने की हिम्मत न कर सके। यह सीधे तौर पर तानाशाही (हिटलरशाही) की ओर बढ़ता हुआ कदम है। जब देश की राजधानी में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार हो सकता है, तो नागरिकों की सुरक्षा और स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा होना स्वाभाविक है।

चुप्पी का परिणाम और जन-जागृति की आवश्यकता

इस गंभीर मोड़ पर समाज की चुप्पी बेहद आत्मघाती सिद्ध हो सकती है। यदि आज युवाओं के दमन पर देश मौन रहा, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। अब समय आ गया है कि लोग अपने मन से इस दमनकारी सत्ता का भय निकालें। युवाओं के इस संघर्ष में हर नागरिक को उनके साथ खड़ा होना होगा। अपने अधिकारों की रक्षा के लिए और इस तानाशाही रवैये के खिलाफ एकजुट होकर लोकतांत्रिक तरीके से 'दो-दो हाथ' करना ही अब एकमात्र विकल्प बचा है।

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