क्रांति का शंखनाद! ( कविता) -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

   


सवाल पूछो तो मौन साधते, उत्तर कोई पास नहीं, 

परीक्षा की जो ट्रिक सिखाते, उन पर अब विश्वास नहीं।

 प्रश्नपत्र लीक होने पर जो चुप्पी साध कर बैठे हैं,

 मन की बात सुनाने वाले, सच से आँखें ऐंठे हैं।

अंधभक्ति के इस दलदल में, कैसा हश्र दिखाया है,

 जाहिल को नेता मानकर, खुद का भविष्य गँवाया है।

 अपने ही हाथों से तुमने, बच्चों के सपने रौंदे,

 कुर्सी के सौदागर बैठे, करने को काले सौदे।

नासमझी की भारी कीमत, जंतर-मंतर चुका रहा,

 लाठियां खाकर लहूलुहान, आज नौनिहाल हो रहा।कल तक जो मसरूफ रहे थे, जाति-धरम के झगड़ों में,

 आज लगी है आग वही, खुद के घर के ही आँगनों में।

पर धन्य भाग्य इन युवाओं का, जिसने आज अंगड़ाई ली,

 काँप उठी दिल्ली की गद्दी, पूरे भारत ने गवाही दी।हिल गई है चूल हुकूमत की, संसद छोड़ वो भाग रहे,

 बहुत बनाया मूर्ख हमें, अब सोते हुए सब जाग रहे।

प्रश्न उठाने वाले को, जो देशद्रोही बतलाते थे,

 जनता की गाढ़ी कमाई पर, जो ऐश सदा उड़ाते थे।

 अब खैर नहीं है अत्याचारी, सब्र का बाँध ये टूटा है,

युवा शक्ति का महाप्रलय, अब तेरे विनाश पर छूटा है।

 छोड़ो अब ये छल-प्रपंच, और बंद करो ये झूठा ठाठ,

 जन-जन की इस अदालत में, देना होगा पूरा हिसाब!

#cocroch 

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