हर भारतीय के लिए वित्तीय स्वास्थ्य का भविष्य !
सिर्फ बैंक खाता न खुले, बल्कि सभी का वित्तीय स्वास्थ्य सुनिश्चित हो।
वर्ल्ड बैंक के 'ग्लोबल फिंडेक्स' के आंकड़ों के अनुसार, भारत में वयस्कों के पास बैंक खातों का स्वामित्व महज 10 वर्षों में 56% से बढ़कर 89% हो गया है। अब भारत का अगला बड़ा कदम सिर्फ बैंक खाते खोलने तक सीमित न रहकर हर नागरिक का वित्तीय स्वास्थ्य सुनिश्चित करना होना चाहिए।
वित्तीय स्वास्थ्य का तात्पर्य केवल बैंक खाता होने से कहीं अधिक है। इसका अर्थ यह है कि नागरिकों के पास ऐसे वित्तीय उत्पाद, नीतियां और सेवाएं उपलब्ध हों जिससे वे:
अपने दैनिक खर्चों का कुशलतापूर्वक प्रबंधन कर सकें।
किसी भी अप्रत्याशित वित्तीय झटके (जैसे बीमारी, नौकरी जाना या प्राकृतिक आपदा) का सामना करने में सक्षम हों।
अपने भविष्य के दीर्घकालिक लक्ष्यों (जैसे सेवानिवृत्ति या शिक्षा) के लिए बचत और निवेश कर सकें।
आत्मविश्वास और सम्मान के साथ जीवन जी सकें।
भारत के 'विकसित भारत 2047' के विजन (कल्याण से धन सृजन) को साकार करने के लिए चार प्रमुख कदम सुझाए गए हैं:
जन धन 2.0 का विकास: प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY) के दूसरे दशक में, इन खातों को सामान्य लेनदेन से आगे बढ़ाकर 'पारिवारिक वित्तीय सुदृढ़ता मंच' में बदला जाए। इसे डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT), PM-KISAN, मनरेगा, अटल पेंशन योजना (APY) और सुरक्षा बीमा योजनाओं (PMJJBY/PMSBY) के साथ पूरी तरह एकीकृत किया जाना चाहिए।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का उपयोग: भारत के मजबूत डिजिटल ढांचे (जैसे महाविस्तार - MahaVISTAAR, अकाउंट एग्रीगेटर्स, यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस - ULI, डिजिलॉकर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का लाभ उठाकर परिवारों को सुरक्षित ऋण, वित्तीय साक्षरता और सही विकल्प चुनने की शक्ति दी जाए।
डेटा-संचालित नीतियां: देश के घरेलू सर्वेक्षणों और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से प्राप्त डेटा का उपयोग उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा करने, धोखाधड़ी रोकने और जवाबदेह नीतियां बनाने में किया जाए।
सार्वजनिक-निजी भागीदारी वित्तीय संस्थानों, नियोक्ताओं और सरकारी नियामकों को मिलकर काम करना चाहिए ताकि बाजार में जिम्मेदार वित्तीय उत्पाद पेश किए जा सकें। नीदरलैंड और इंडोनेशिया जैसे देश इस तरह के सहयोगात्मक मॉडल पर काम कर रहे हैं।

Comments
Post a Comment