जन्मजात नागरिकता: अमेरिका का संवैधानिक संकट और भारतीय परिप्रेक्ष्य !
यह लेख अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले पर केंद्रित है, जिसमें अमेरिका में जन्में बच्चों को नागरिकता देने वाले जन्मजात नागरिकता कानून को बहुत ही कम अंतर (एक वोट) से बरकरार रखा गया है। यह घटना अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था की नाजुकता को दर्शाती है।
ट्रम्प प्रशासन ने एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से उन बच्चों को नागरिकता देने से रोकने का प्रयास किया था जिनके माता-पिता गैर-नागरिक हैं।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है, क्योंकि यह मामला राजनीतिक विचारधाराओं के ध्रुवीकरण के करीब पहुंच गया था।
यदि यह अधिकार समाप्त कर दिया जाता, तो यह न केवल मानवीय संकट पैदा करता बल्कि यह निर्धारित करना भी असंभव हो जाता कि कौन नागरिक है और कौन नहीं।
अमेरिका और भारत दोनों लोकतंत्र हैं, लेकिन जन्मजात नागरिकता के प्रति दोनों का दृष्टिकोण काफी भिन्न है:
कानूनी आधार: * अमेरिका: वहां का संविधान (14वां संशोधन) मुख्य रूप से 'मिट्टी के अधिकार' (Jus Soli) पर आधारित है, यानी जो अमेरिका की भूमि पर जन्मा, वह नागरिक है।
भारत: भारत ने समय के साथ अपनी नीति को बदला है। स्वतंत्रता के बाद भारत में भी जन्मजात नागरिकता का नियम उदार था, लेकिन बाद के संशोधनों (विशेषकर नागरिकता अधिनियम 1955 के संशोधन) के माध्यम से इसे सख्त कर दिया गया है। आज भारत में केवल जन्म लेना ही नागरिकता के लिए पर्याप्त नहीं है; माता-पिता में से कम से कम एक का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है।
अमेरिका: यह मुद्दा वहां 'इमीग्रेशन' और 'बर्थ टूरिज्म' से जुड़ा है।
भारत: भारत में नागरिकता का मुद्दा मुख्य रूप से 'अवैध प्रवासन' और राष्ट्रीय सुरक्षा से प्रेरित है, जैसा कि हमने असम में NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) के दौरान देखा। भारत में यह मुद्दा "कौन भारतीय है" के बजाय "बाहरी कौन है" पर अधिक केंद्रित रहता है।
न्यायपालिका की भूमिका: * अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट के "राजनीतिक रूप से विभाजित" होने की चिंता जताई गई है। भारत में भी नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) जैसे मामलों में न्यायपालिका की भूमिका पर बहस होती रही है, लेकिन भारतीय संदर्भ में बहस नागरिकता के विस्तार के बजाय उसके विनियमन और पहचान को लेकर अधिक है।
नागरिकता केवल एक कानूनी दर्जा नहीं, बल्कि एक मौलिक मानवीय अधिकार है। जहां अमेरिका जन्मजात नागरिकता के 'पुराने गौरव' को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं भारत अपनी सीमाओं और जनसांख्यिकीय अखंडता को सुरक्षित रखने के लिए नागरिकता के मानदंडों को अधिक कठोर बना चुका है। दोनों देशों के अनुभव यह सिखाते हैं कि नागरिकता जैसे आधारभूत मुद्दे पर कानून का स्पष्ट होना लोकतंत्र की स्थिरता के लिए अनिवार्य है।

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