भारत के युवाओं की बदलती आकांक्षाएँ और परिवार की नई परिभाषा!

   


भारत में परिवार और विवाह को हमेशा सामाजिक जीवन का आधार माना गया है, लेकिन आज के युवा इन परंपरागत मूल्यों को नए दृष्टिकोण से देख रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के डेमोग्राफिक फ्यूचर्स सर्वे के अनुसार, अधिकांश युवा परिवार बनाना चाहते हैं, परंतु वे इसके लिए अनुकूल आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों की भी अपनी स्वतंत्र पसंद का विषय मानते हैं। महँगाई, रोजगार की अनिश्चितता, आवास की समस्या और आर्थिक सुरक्षा की कमी उन्हें विवाह और संतानोत्पत्ति के निर्णय में सावधान बनाती है। विशेष रूप से महिलाओं पर घर और कार्यस्थल दोनों की अपेक्षा रखते हैं।

सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि युवा कम बच्चे चाहते हैं और परिवार नियोजन को अपनी स्वतंत्र पसंद का विषय मानते हैं। महँगाई, रोजगार की अनिश्चितता, आवास की समस्या और आर्थिक सुरक्षा की कमी उन्हें विवाह और संतानोत्पत्ति के निर्णय में सावधान बनाती है। विशेष रूप से महिलाओं पर घर और कार्यस्थल दोनों की जिम्मेदारियों का असमान बोझ उन्हें परिवार और करियर के बीच कठिन चुनाव करने के लिए विवश करता है।

युवाओं की चिंताओं में जलवायु परिवर्तन, बढ़ती बेरोज़गारी, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य की असुरक्षा भी प्रमुख हैं। वे चाहते हैं कि सरकार और समाज ऐसी नीतियाँ बनाएँ जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, रोजगार, सुरक्षित कार्यस्थल, सस्ती आवास व्यवस्था और परिवार–हितैषी कार्यसंस्कृति उपलब्ध कराएँ। इससे वे अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में संतुलन स्थापित कर सकेंगे।

भारत के विभिन्न राज्यों में जनसंख्या और प्रजनन दर की स्थिति अलग-अलग है, इसलिए एक समान नीति सभी राज्यों की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकती। क्षेत्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर योजनाएँ बनाना अधिक प्रभावी होगा।

भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में से एक है। यदि युवाओं को बेहतर अवसर, सुरक्षा और अनुकूल वातावरण मिले, तो वे अपने सपनों के साथ-साथ मजबूत और संतुलित परिवार भी बना सकेंगे। स्पष्ट है कि आज का भारतीय युवा परिवार की संस्था को अस्वीकार नहीं कर रहा, बल्कि वह ऐसे सामाजिक और आर्थिक परिवेश की अपेक्षा करता है जिसमें उसकी आकांक्षाएँ और पारिवारिक जीवन दोनों समान रूप से फल-फूल सकें।











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