भारत में क्यों बढ़ रही है महंगाई?: एक विश्लेषण
भारत में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित मुद्रास्फीति में हाल के महीनों में तेज उछाल देखा गया है। सामान्य आर्थिक धारणा यह मानती है कि महंगाई तब बढ़ती है जब मांग, आपूर्ति से अधिक हो जाती है । हालांकि, वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था का गहन विश्लेषण यह दर्शाता है कि यह उछाल मांग में वृद्धि के कारण नहीं, बल्कि सप्लाई शॉक और लागत में वृद्धि का परिणाम है।
1. प्राथमिक वस्तुएं बनाम विनिर्मित वस्तुएं (संरचनात्मक अंतर)
पोलिश अर्थशास्त्री माइकल कालेकी के सिद्धांत के अनुसार, प्राथमिक और विनिर्मित वस्तुओं के मूल्य निर्धारण का तरीका अलग-अलग होता है:
प्राथमिक वस्तुएं : इनमें कृषि उत्पाद (जैसे सब्जियां, फल आदि) शामिल हैं। इनकी आपूर्ति अल्पावधि में निश्चित होती है। जब मॉनसून खराब होता है या मौसम की मार पड़ती है, तो आपूर्ति घट जाती है और कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं। यह मांग और आपूर्ति के असंतुलन से तय होती हैं।
विनिर्मित वस्तुएं : इनकी कीमतें केवल मांग से तय नहीं होतीं, बल्कि उत्पादन लागत और उस पर कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन से तय होती हैं।
2. मुद्रास्फीति के मुख्य चालक
खाद्य मुद्रास्फीति और मौसम का प्रभाव: एल नीनो और अपर्याप्त मॉनसून के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है। ऐतिहासिक आंकड़ों से स्पष्ट है कि जब-जब देश ने सूखे की स्थिति झेली है, तब-तब खाद्य मुद्रास्फीति में भारी वृद्धि हुई है।
ईंधन और कच्चे माल की बढ़ती लागत: वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और ईंधन की कीमतें बढ़ने से उत्पादन लागत में सीधे तौर पर बढ़ोतरी हुई है। चूंकि ईंधन का उपयोग विनिर्माण और परिवहन दोनों में होता है, इसलिए इसका प्रभाव विनिर्मित वस्तुओं की कीमतों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
मजदूरी का कम प्रभाव: आंकड़ों के अनुसार, भारतीय श्रमिकों के पास श्रम बाजार में अधिक मजदूरी की सौदेबाजी की शक्ति सीमित है। इसलिए महंगाई बढ़ाने में मजदूरी वृद्धि का नहीं, बल्कि कच्चे माल और ईंधन की लागत का हाथ है।
3. समाधान: आगे का रास्ता
मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए केवल पारंपरिक मौद्रिक नीतियों (जैसे ब्याज दरें बढ़ाना) पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए ठोस संरचनात्मक नीतिगत कदमों की आवश्यकता है:
कृषि क्षेत्र में निवेश: भारत को अपनी कृषि प्रणाली को मॉनसून की अनिश्चितताओं से मुक्त करना होगा। इसके लिए सिंचाई बुनियादी ढांचे में भारी सार्वजनिक निवेश जरूरी है।
प्रति-चक्रीय कर नीति : विनिर्मित वस्तुओं और ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार को सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क में कटौती करनी चाहिए। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ें, तब करों को घटाकर घरेलू कीमतों में उछाल को रोका जा सकता है।
भारत में मुद्रास्फीति का वर्तमान संकट मुख्य रूप से ईंधन और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति में आए झटकों की देन है। इसे नियंत्रित करने के लिए अल्पकालिक मौद्रिक उपायों के बजाय कृषि अवसंरचना को मजबूत करने और राजकोषीय कर राहत देने की दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी।

Comments
Post a Comment