E20 ईंधन नीति: पारदर्शिता का अभाव और उपभोक्ता का संशय !
क्या एक बड़ी नीतिगत बदलाव के लिए केवल तकनीकी तैयारी पर्याप्त है, यदि उपभोक्ता ही विश्वास में न लिया गया हो?
हालांकि सरकार, वाहन निर्माताओं और इथेनॉल डिस्टिलर्स के बीच व्यापक विचार-विमर्श हुआ, लेकिन इन प्रयोगों के निष्कर्षों को वाहन खरीदारों के साथ पर्याप्त रूप से साझा नहीं किया गया। यह सूचना का अभाव सीधे तौर पर जनता के बीच 'इंजन के स्वास्थ्य' को लेकर भ्रामक जानकारी और डर पैदा करने का आधार बना।
ईंधन विकल्प के मामले में उपभोक्ताओं की पसंद को चुनौती दी जा रही है। नीति निर्माताओं की यह लापरवाही कि उन्होंने उपभोक्ताओं को इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया या उन्हें आश्वस्त नहीं किया, एक गंभीर 'कम्युनिकेशन गैप' (संवाद की खाई) पैदा करती है।
सरकार और उद्योग जगत का रुख 'प्रतिक्रियाशील' रहा है, न कि 'सक्रिय' ! भ्रामक सूचनाओं को दूर करने के लिए पूर्व-सक्रिय कदम उठाने के बजाय, एक 'आत्मसंतुष्टि' का माहौल विकसित हुआ है। यह तब और अधिक गंभीर हो जाता है जब हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े ऑटोमोबाइल बाजार की बात कर रहे हों। यद्यपि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु प्रतिबद्धताओं के लिए ईंधन मिश्रण कार्यक्रम को गति देना आवश्यक है! 'नीति को जनता को साथ लेकर चलना चाहिए'। बिना पारदर्शिता के, किसी भी बड़े बदलाव का आर्थिक और सामाजिक प्रभाव नकारात्मक हो सकता है।
तकनीकी सफलता (इथेनॉल मिश्रण का बिना किसी समस्या के चलना) ही एकमात्र लक्ष्य नहीं होना चाहिए। वास्तविक सफलता तब है जब नीति निर्माता व्यापक स्टेकहोल्डर (हितधारक) बेस का निर्माण करें। वर्तमान में, E20 ईंधन के मामले में 'स्पष्ट संदेश' का अभाव ही उपभोक्ता के अविश्वास की जड़ है, जिसे केवल पारदर्शी प्रक्रिया और बेहतर संवाद से ही ठीक किया जा सकता है।

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