भारत में 'जेन जेड' (Gen Z) के लिए घटते रोजगार की कड़वी सच्चाई !
भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में से एक है, लेकिन इस 'जनसांख्यिकीय लाभांश' का लाभ तभी मिल सकता है जब युवाओं को शिक्षा के बाद बेहतर और उत्पादक रोजगार मिले। समय के साथ यह स्थिति मजबूत होने के बजाय बिगड़ती दिख रही है, जिसका सबसे बड़ा असर 'जेन जेड' (Gen Z - 15 से 26 वर्ष आयु वर्ग) पर पड़ रहा है।
प्रमुख आंकड़े और जमीनी स्थिति
श्रम बल भागीदारी (LFPR): जेन जेड (Gen Z) में श्रम बल भागीदारी दर मात्र 41.7% है, जबकि 'मिलिनियल्स' (Millennials - 27 से 42 वर्ष) में यह 75% है।
लैंगिक विषमता (Gender Gap): ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष युवाओं की श्रम भागीदारी 59.3% है, जबकि महिलाओं के लिए यह आंकड़ा केवल 28% (ग्रामीण) और 21.1% (शहरी) ही है।
बेरोजगारी दर
जेन जेड में कुल बेरोजगारी 11.9% है (मिलिनियल्स के 2% के मुकाबले)।
शहरी इलाकों में यह स्थिति और भयावह है, जहाँ Gen Z बेरोजगारी 17.1% तक पहुँच गई है।
शहरी युवा महिलाओं के लिए यह दर रिकॉर्ड 22.6% के खतरनाक स्तर पर है।
संकट के मुख्य कारण और चुनौतियाँ
'ग्रेजुएट ट्रैप' (शिक्षित बेरोजगारी): शिक्षा का स्तर बढ़ने के साथ ही बेरोजगारी दर घटने के बजाय बढ़ी है। स्नातक या उससे अधिक पढ़े-लिखे जेन जेड पुरुषों में बेरोजगारी 29% और महिलाओं में 36.9% है।
स्किल मिसमैच व AI का प्रभाव: शिक्षा प्रणाली और बाजार की जरूरतों में बड़ा अंतर है। साथ ही ऑटोमेशन और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते असर ने पारंपरिक नौकरियों को कम कर दिया है।
रोजगार की गिरती गुणवत्ता व अनौपचारिकता:
जेन जेड के केवल 17.3% कामकाजी युवाओं के पास ही किसी प्रकार का औपचारिक अनुबंध है।
मात्र 20.1% युवा ही सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आते हैं।
अधिकांश युवा अनौपचारिक, कम वेतन और बिना किसी सुरक्षा वाली नौकरियों में काम करने को मजबूर हैं।
समाधान का मार्ग
भारत को केवल अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का ढिंढोरा पीटने के बजाय व्यावहारिक और नीतिगत बदलाव करने होंगे:
श्रम-गहन क्षेत्रों का विस्तार: भारी संख्या में नौकरियां पैदा करने के लिए ऐसे उद्योगों को बढ़ावा देना होगा जहाँ अधिक श्रम की आवश्यकता हो।
शिक्षा और उद्योग का जुड़ाव: ट्रेनिंग और अप्रेंटिसशिप कार्यक्रमों को सीधे नियोक्ताओं की जरूरतों से जोड़ना।
महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना: सुरक्षित परिवहन, चाइल्डकेयर सुविधाएं और सामाजिक सोच में बदलाव लाकर महिलाओं के लिए कार्यबल में आना आसान बनाना।
शहरी रोजगार योजनाएं व सुरक्षा: शहरों में रोजगार विस्तार योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा ढाँचे को मजबूत करना।
भारत की असली चुनौती यह नहीं है कि युवा काम के लिए तैयार नहीं हैं, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या हमारी अर्थव्यवस्था युवाओं के लिए पर्याप्त और सम्मानजनक रोजगार पैदा करने के लिए तैयार है?

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