हमारी अनदेखी प्रेम कहानी: जहाँ हम जैसे हैं, वैसे ही स्वीकारे जाते हैं! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।
रोमांटिक फिल्मों और चर्चित उपन्यासों ने सदियों से हमें यही सिखाया है कि प्रेम में दो लोग एक-दूसरे को ‘पूरा’ करते हैं और एक-दूसरे की ‘दुनिया’ बन जाते हैं। लेकिन किसी की पूरी दुनिया बनने का प्रयास केवल एक मुगालता है—यह मानसिक और भावनात्मक रूप से बेहद थका देने वाला सफ़र है।
जीवन के रंगमंच पर हर रिश्ते की अपनी माँगें और शर्तें होती हैं:
रोमांटिक प्रेम बराबरी की साझेदारी और निरंतर अपेक्षाओं की माँग करता है।
माता-पिता होना आपसे धैर्य का कभी न समाप्त होने वाला महासागर बनने को कहता है।
कार्यक्षेत्र आपसे हर पल कुशल, पेशेवर और त्रुटिहीन रहने की उम्मीद रखता है।
लेकिन दोस्ती—शायद यह दुनिया का इकलौता ऐसा रिश्ता है, जो एक सक्षम और समझदार वयस्क के मुखौटे के पीछे छिपे हमारे अधूरे, थोड़े सिरफिरे और बेहद कच्चे रूप को बिना किसी शर्त के गले लगा लेता है।
मौन को समझने वाला सच्चा निस्वार्थ संबल
शास्त्रीय उक्ति—“जो न होइ मित्र के दुख से दुखारी...”—आज के आधुनिक युग में भी उतनी ही चरितार्थ होती है जितनी सदियों पहले थी। सच्चा मित्र वह है जो बिना एक शब्द सुने आपकी मनःस्थिति, परिस्थितियों और अंतरद्वंद्व को भांप ले।
समय, स्थान और कार्यक्षेत्र के बदलने से जीवन में नए-नए लोग आते हैं, नए सहयोगी जुड़ते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि हम पुराने नीम के वृक्ष जैसी छाया देने वाले मित्रों को भूल जाएँ। दोस्ती न तो चापलूसी की मोहताज है और न ही लगातार खिंचाई की; यह एक गरिमापूर्ण संतुलन का नाम है।
कार्यस्थल के मित्र अक्सर सहयोगियों के साथ-साथ ईर्ष्यालु प्रतिस्पर्धी भी हो सकते हैं। वे आपकी एक छोटी सी चूक का इंतज़ार करते हैं ताकि ढोल पीट सकें—ऐसे रिश्तों के प्रति सतर्क रहना बुद्धिमानी है। वहीं दूसरी ओर, सच्चा मित्र पाने के लिए दूसरों पर दोष मढ़ने से पहले खुद की नीयत और परख को तराशना पड़ता है। निष्कपट और सच्चे मित्र भाग्य से मिलते हैं।
विशेषकर उम्र के 30वें पड़ाव को पार करने के बाद उन दोस्तों की अहमियत और अधिक गहरी हो जाती है, जिन्होंने हमारे जीवन का भारी-भरकम बोझ अपने कंधों पर बाँटा है। ये वे लोग हैं जिन्होंने एक ही दशक में हमें जीवन के कई बदलते पड़ावों से गुज़रते देखा है।
हमारे करियर के उतार-चढ़ाव और हर नए निर्णय में हमारा हौसला बढ़ाया।
हमें सबसे ज़्यादा टूटी हुई हालत में देखा—चाहे वह गहरे व्यक्तिगत दुख का दौर हो या असफलता का दंश—और फिर भी हमारे साथ चट्टान की तरह खड़े रहे।
यदि निष्पक्ष होकर सोचें, तो दुनिया से अपना असली ‘बेटर हाफ’ या ‘आधा हिस्सा’ कहकर मिलाने का नैतिक हक़ जीवनसाथी से पहले इन्हीं दोस्तों का है।
बीड़ी के धुएँ से मैमोग्राम के इंतज़ार तक: ढलता समय, अविचल आत्मीयता
सच्ची दोस्ती समय के साथ अपना रूप बदलती है, लेकिन उसकी आत्मा सदा एक जैसी निर्मल रहती है:
18 साल की उम्र का वह अल्हड़पन: जब किसी छोटी सी बात पर कॉलेज ट्रिप के दौरान प्रिंसिपल के कमरे के बाहर विरोध दर्ज कराने के लिए दोस्त साथ में बीड़ी के कश खींचते थे...
38 साल की परिपक्वता: वही दोस्त आज अस्पताल के वेटिंग रूम में बैठकर, अपने मैमोग्राम टेस्ट की अपनी घबराहट के बीच भी, दूसरों के फोन पर आपके नए स्टार्टअप का कैटलॉग भेजने में जुटी रहती है।
यह यात्रा दर्शाती है कि उम्र के साथ प्राथमिकताएं और परिस्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन एक-दूसरे के प्रति समर्पण का भाव नहीं बदलता।
बिना शर्त का आलिंगन: जहाँ खामोशी भी सुरक्षित है
सच्चे दोस्तों के आँगन में आपको कभी जज होने का डर नहीं होता। जब आप बिना कुछ कहे चुप हो जाते हैं, तो वे आपकी खामोशी का गलत अर्थ निकालने या रुठने के बजाय आपकी चिंता करते हैं।
यदि दो हफ्तों तक आपके मैसेजों का कोई जवाब न मिले, तो एक सच्चा दोस्त महाद्वीपों की दूरी तय करके आपके दरवाज़े पर सिर्फ यह कहने आ जाता है—“मुझे लगा कि कुछ ठीक नहीं है, इसलिए मैं यहाँ हूँ।”
रात के दो बजे, आइसक्रीम के डिब्बे के साथ उनका दिया एक बेफिक्र आलिंगन मन के बिखरे हुए काँच जैसे टुकड़ों को फिर से समेटकर जोड़ देता है।
दोस्ती कोई लिखी हुई औपचारिक पटकथा या सामाजिक अनुबंध नहीं है। यह तो जीवन की वह सबसे सुंदर, अनदेखी और अलिखित प्रेम कहानी है—जो बिना किसी ढोल-नगाड़े या बड़ी घोषणाओं के, ताउम्र हमारे साथ साये की तरह चलती रहती है।



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