सुशासन की बलिवेदी पर 'सुशासन': जब बिहार में नौकरशाही भी अपराधियों के निशाने पर आ गई!

 




बिहार में 'सुशासन' का दावा लंबे समय से प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक मंचों का मुख्य नारा रहा है। लेकिन जब राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति इस कदर बिगड़ जाए कि जनता की रक्षा और नीति-निर्माण में लगे प्रशासनिक अधिकारी ही सुरक्षित न रहें, तो इस 'सुशासन' की खोखली दीवारों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। औरंगाबाद में कार्यपालक पदाधिकारी (EO) की दिन-दहाड़े या निर्मम हत्या ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राज्य में कानून का डर लगभग समाप्त हो चुका है और अपराधी बेखौफ होकर अपनी मनमर्जी चला रहे हैं।

औरंगाबाद में EO की हत्या केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं है, बल्कि यह राज्य के प्रशासनिक इक़बाल पर करारा तमाचा है। जिस व्यवस्था में अधिकारी अपनी जान की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहें, वहाँ आम जनता न्याय और सुरक्षा की उम्मीद किससे करे? जब विकास योजनाओं को लागू करने वाले और भ्रष्टाचार पर नकेल कसने वाले अफसरों की आवाज गोलियों की गूँज से दबा दी जाती है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि सत्ता का नियंत्रण नेताओं के हाथों से फिसलकर 'समानांतर सत्ता' चलाने वाले अपराधियों के हाथों में चला गया है।

औरंगाबाद की घटना को कोई एक छिटपुट या अकेला हादसा कहकर टाल नहीं सकता। अगर बीते कुछ समय के पन्नों को पलटें, तो बिहार में हाई-प्रोफाइल हत्याओं और दुस्साहसिक अपराधों की एक लंबी फेहरिस्त सामने आती है:

पत्रकारों और आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्याएँ: सच दिखाने वाले पत्रकारों और पंचायतों से लेकर नगर निकायों तक भ्रष्टाचार उजागर करने वाले आरटीआई (RTI) कार्यकर्ताओं की लक्षित हत्याएँ बिहार में आम हो चुकी हैं।

पटना, मुजफ्फरपुर और बेगूसराय जैसे प्रमुख व्यावसायिक केंद्रों में रंगदारी न देने पर बड़े व्यापारियों की हत्याएँ लगातार सुर्खियाँ बनती रही हैं।

बालू और शराब माफिया के आगे पुलिस प्रशासन कितना पंगु बना हुआ है, इसका प्रमाण उन घटनाओं से मिलता है जहाँ अवैध खनन या तस्करी रोकने गए पुलिस अधिकारियों और जवानों को माफियाओं द्वारा ट्रैक्टरों से कुचलकर या गोलियाँ मारकर मार दिया गया।

 त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के प्रतिनिधियों से लेकर राजनीतिक दलों के बड़े चेहरों तक की हत्याओं ने यह साफ कर दिया है कि राजनीतिक वैमनस्य और वर्चस्व की जंग में कानून-व्यवस्था पूरी तरह असहाय है।

सरकारें बदलती रहीं, गठबंधन बदलते रहे और बयानों की शब्दावली बदलती रही, लेकिन धरातल पर आम नागरिक का दर्द नहीं बदला। जब भी अपराध का ग्राफ बढ़ता है, तो सत्ता पक्ष केवल आंकड़ों की बाजीगरी करके खुद को पाक-साफ साबित करने की कोशिश करता है या फिर अतीत की सरकारों से अपनी तुलना करने लगता है।

सवाल यह है कि क्या वर्तमान की नाकामी को छुपाने के लिए अतीत का बहाना बनाना तर्कसंगत है? 'जीरो टॉलरेंस' का ढोल पीटने वाला प्रशासन जब हर बड़ी वारदात के बाद केवल 'जांच के आदेश' और 'दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा' जैसे रटे-रटाए जुमले उछालता है, तो जनता का भरोसा व्यवस्था से पूरी तरह उठ जाता है।

औरंगाबाद के EO की हत्या ने बिहार के प्रशासनिक ढाँचे को झकझोर कर रख दिया है। अगर राज्य सरकार वास्तव में सुशासन के प्रति गंभीर है, तो उसे केवल पुलिसिया गश्त बढ़ाने के कागजी दावों से आगे निकलना होगा। अपराधियों में कानून का खौफ बहाल करना होगा, राजनीतिक संरक्षण प्राप्त माफियाओं की कमर तोड़नी होगी और प्रशासनिक अधिकारियों को बिना किसी दबाव के काम करने का सुरक्षित माहौल देना होगा।

यदि सरकार अब भी कड़े कदम उठाने में विफल रहती है, तो 'सुशासन' का यह नारा इतिहास के पन्नों में केवल एक राजनीतिक छलावा बनकर रह जाएगा।

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