डिजिटल अरेस्ट' और साइबर ठगी का विदेशी जाल: चुनौतियाँ और समाधान!
यह आलेख सभी को पढ़ना चाहिए।
सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता और सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देशों के बावजूद विदेशों से संचालित साइबर अपराध नेटवर्क भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
भारत में डिजिटल तकनीक और वित्तीय समावेश के विस्तार के साथ-साथ 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे साइबर अपराधों का खतरा भी तेजी से बढ़ा है। हालांकि, हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दिशानिर्देश और साइबर सुरक्षा एजेंसियों की तत्परता इस दिशा में एक राहत भरी खबर लेकर आई है।
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज शिकायतों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई है:
वर्ष 2024 में साइबर ठगी की 1,23,672 शिकायतें दर्ज की गई थीं।
वर्ष 2025 में यह घटकर 58,249 रह गईं।
वर्ष 2026 के पहले छह महीनों में यह आंकड़ा 16,377 पर आ गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इन आंकड़ों को "उत्साहजनक" बताते हुए भी यह स्पष्ट किया है कि सुरक्षा में ढिलाई की कोई गुंजाइश नहीं है।
साइबर ठगी के खिलाफ तंत्र को मजबूत करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में कई अहम निर्देश जारी किए हैं:
म्यूल खातों पर रोक: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को 'म्यूल अकाउंट्स' (फर्जी या भाड़े के बैंक खाते) पर तत्काल 'डेबिट होल्ड' (लेन-देन पर रोक) लागू करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया जारी करने का निर्देश दिया गया है।
सभी राज्यों को राज्य स्तरीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र अधिसूचित करने और 'ई-जीरो एफआईआर' (e-Zero FIR) प्रणाली को पूरी तरह चालू करने को कहा गया है।
पीड़ितों को क्षतिपूर्ति दिलाने की संभावनाओं की जांच के लिए एक अंतर-विभागीय समिति गठित करने का आदेश दिया गया है।
अब तक 36,290 मामलों में लगभग ₹18.05 करोड़ की राशि पीड़ितों को वापस लौटाई जा चुकी है। साथ ही, 20 से अधिक बैंकों में MuleHunter.AI जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग कर संदिग्ध खातों को चिह्नित किया जा रहा है।
बैंकों, पुलिस और दूरसंचार कंपनियों द्वारा जारी परामर्श के कारण अब बुजुर्गों में जागरूकता बढ़ी है, लेकिन ठगों ने अब युवाओं और पेशेवरों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है।
ठग कानून-व्यवस्था से एक कदम आगे रहने के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं:
सिम बॉक्स (SIM Boxes): इसके जरिए विदेशी कॉल को भारतीय नंबर की तरह दिखाकर लोगों को भ्रमित किया जाता है।
वीडियो कॉल पर पुलिस या जांच एजेंसी के अधिकारियों का फर्जी चेहरा बनाकर पीड़ितों को डराया जाता है।
मल्टीपल म्यूल अकाउंट्स: ठगी की राशि को तुरंत कई राज्यों के अलग-अलग खातों में भेजकर गायब कर दिया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और कूटनीतिक दबाव की जरूरत
साइबर अपराधियों को सजा दिलाना (Conviction) अभी भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसका मुख्य कारण यह है कि अधिकांश 'डिजिटल अरेस्ट' और साइबर ठगी के रैकेट म्यांमार, कंबोडिया और 'गोल्डन ट्रायंगल' के देशों में बने "स्कैम कंपाउंड्स" से चलाए जा रहे हैं।
मानव तस्करी: 2023 में चीन द्वारा अपने नागरिकों को निशाना बनाने वाले स्कैम सेंटरों पर की गई सख्त कार्रवाई के बाद इन अपराधियों ने भारत जैसे देशों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि भारतीय युवाओं को नौकरी का झांसा देकर विदेश ले जाया जाता है और बंधक बनाकर अपने ही देश के लोगों के खिलाफ डिजिटल अपराध करने पर मजबूर किया जाता है।
वैश्विक सहयोग जरूरी: केवल घरेलू स्तर पर जांच या खाते फ्रीज करने से यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। भारत (नई दिल्ली) को चीन, अमेरिका और आसियान देशों के साथ मिलकर म्यांमार (नेपिडॉ) और कंबोडिया (नामपेन्ह) की सरकारों पर कूटनीतिक दबाव बनाना होगा ताकि इन अंतरराष्ट्रीय साइबर गिरोहों का पूरी तरह सफाया किया जा सके।
'डिजिटल अरेस्ट' जैसी ठगी केवल एक तकनीकी या वित्तीय अपराध नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की सुरक्षा और देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था के विश्वास पर सीधा हमला है। आम जनता में जागरूकता बढ़ाने, त्वरित पुलिस कार्रवाई, एआई-आधारित पहचान प्रणालियों और कूटनीतिक प्रयासों के समन्वय से ही इस वैश्विक खतरे पर स्थायी रोक लगाई जा सकती है।

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