युवाओं के भविष्य पर प्रहार: परीक्षा, पेपर लीक और व्यवस्थागत संवेदनहीनता!
देश का युवा आज अपनी मेहनत, उम्मीदों और स्वाभिमान को ध्वस्त होते देखने के लिए मजबूर है। प्रयागराज में राहुल गांधी द्वारा आयोजित छात्रों की सभा में जो दर्द छलक कर बाहर आया, वह केवल कुछ अभ्यर्थियों की शिकायत नहीं, बल्कि इस देश की पूरी चयन-प्रणाली और प्रशासनिक नीति के मुंह पर एक करारा तमाचा है। आज भारत का युवा एक ऐसे दुष्चक्र में फंस चुका है जहाँ रोजगार पाना किसी परीक्षा को पास करने से ज्यादा, व्यवस्था की संवेदनहीनता से लड़ने का युद्ध बन गया है।
छात्रों का दर्द इस बात की तस्दीक करता है कि अब रोजगार पाना तो दूर, परीक्षा का विज्ञापन (नोटिफिकेशन) निकलवाने के लिए भी उन्हें सड़कों पर लाठियां खानी पड़ती हैं। लंबी जद्दोजहद के बाद जब परीक्षा आयोजित होती है, तो अगली सुबह पेपर लीक की खबर उनके सपनों को चकनाचूर कर देती है। इसके बाद पुन: परीक्षा (री-एग्जाम) और निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर युवाओं को फिर से विरोध प्रदर्शन करना पड़ता है। लेकिन इस भ्रष्ट व्यवस्था की सबसे शर्मनाक बात यह है कि न्याय मांगने वाले इन बेबस छात्रों को ही पुलिस प्रशासन द्वारा फर्जी मुकदमों और मुकदमों की धमकियों में उलझा दिया जाता है।
यह केवल नीतियों की विफलता नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के साथ खिलवाड़ है। छात्र कर्ज लेकर, अपनी पारिवारिक जमीनें बेचकर और पेट काटकर शहरों में रहकर पढ़ाई करते हैं। लेकिन सरकार की युवा-विरोधी नीतियों और पारदर्शी परीक्षाएं कराने में उसकी पूर्ण विफलता ने देश में बेरोज़गारों की एक लंबी और बेबस फौज खड़ी कर दी है।
प्रयागराज की इस सभा में राहुल गांधी ने भी छात्रों के इस दर्द को मुखरता से आवाज दी और वर्तमान व्यवस्था पर तीखे हमले किए। अपने वक्तव्य में उन्होंने मुख्य रूप से निम्नलिखित मुद्दों को रेखांकित किया:
पेपर लीक का संगठित तंत्र: राहुल गांधी ने कहा कि आज देश में पेपर लीक केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक संगठित उद्योग बन चुका है, जिसमें परीक्षा माफिया और प्रशासनिक तंत्र की मिलीभगत है। इसका सीधा नुकसान सामान्य और गरीब परिवारों से आने वाले मेधावी छात्रों को उठाना पड़ रहा है।
संस्थागत विफलता और निजीकरण: उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी विभागों में खाली पड़े लाखों पदों को भरने के बजाय सरकार संविदा और आउटसोर्सिंग जैसी अनिश्चित नीतियों को बढ़ावा दे रही है, जिससे युवाओं का सामाजिक और आर्थिक शोषण बढ़ रहा है।
युवाओं की आवाज दबाने का प्रयास: विरोध करने वाले छात्रों पर दर्ज मुकदमों पर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा कि जब युवा अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत रोजगार और पारदर्शिता की मांग करते हैं, तो सरकार अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए उन्हें दबाने और डराने का काम करती है।
यदि कोई सरकार देश के युवाओं को सुरक्षित भविष्य, निष्पक्ष परीक्षा और रोजगार की गारंटी नहीं दे सकती, तो उसे 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकी लाभांश) का ढोल पीटने का कोई अधिकार नहीं है। सपनों को नीलाम करती यह व्यवस्था अगर जल्द नहीं बदली गई, तो युवाओं का यह आक्रोश केवल आंदोलन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने का काम करेगा।

Comments
Post a Comment