शिवचरण गुप्ता के अंतिम संस्कार में तीनों बेटियाँ भी नहीं आ सकी।
काँच की चूड़ियाँ और 5100 का ट्रांसफर !
सोनीपत के ककरोई गाँव का 'आनंदाश्रम' वृद्धाश्रम उस शाम पूरी तरह शांत था। कमरा नंबर 12 में रखी वो पुरानी लोहे की ट्रंक, जिसे शिवचरण गुप्ता जी हमेशा अपने पास रखते थे, आज पहली बार खुली पड़ी थी। उसी ट्रंक के एक कोने में ढेरों पुरानी तस्वीरें और कुछ लाल-हरी काँच की टूटी चूड़ियाँ रखी थीं।
शिवचरण जी अब उस कमरे में नहीं थे। मंगलवार की सुबह उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली थी।
एक समय था जब मुंबई के बड़ा बाज़ार में शिवचरण गुप्ता का नाम कपड़ा कारोबार की दुनिया में इज़्ज़त से लिया जाता था। करोड़ों का टर्नओवर, बड़ा मकान और हाथ जोड़कर खड़े रहने वाले दर्जनों मुलाज़िम। लेकिन उनके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी उनका कारोबार नहीं, बल्कि उनकी तीन बेटियाँ थीं।
"बेटियों को पढ़ाओगे तो वे पराया धन बन जाएँगी," लोग कहते थे।
पर शिवचरण जी मुस्कुरा कर जवाब देते, "मेरी बेटियां मेरी नींव हैं, मेरी ताकत हैं।" उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई का एक-एक पैसा बेटियों की पढ़ाई पर लगा दिया। तीनों को पढ़ा-लिखाकर शिक्षिका बनाया—ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें, स्वाभिमानी बन सकें। बड़ी बेटी मुंबई में सेटल हो गई, दूसरी नेपाल और तीसरी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में।
किस्मत का पहिया घुमा और कपड़ा व्यापार में भारी घाटा हो गया। कारोबार बंद हो गया और जमा-पूँजी धीरे-धीरे खत्म हो गई। जब शिवचरण जी को सबसे ज़्यादा अपनों की ज़रूरत थी, तब वे तीनों बेटियाँ अपनी-अपनी दुनिया में इतनी व्यस्त हो गईं कि पिता की सुध लेने की फुर्सत किसी को न मिली।
शिवचरण जी अपनी पत्नी के साथ बड़ी बेटी के घर मुंबई भी गए, पर वहाँ के बदले हुए माहौल और अनदेखी ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। स्वाभिमानी शिवचरण जी ने अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और पत्नी का हाथ थामकर सोनीपत के वृद्धाश्रम में आ गए।
डेढ़ साल पहले जब पत्नी की मृत्यु हुई, तब भी आश्रम के मुख्य द्वार की ओर शिवचरण जी की आँखें टकटकी लगाए देखती रहीं। पर कोई बेटी नहीं आई।
और आज, जब 80 वर्ष की उम्र में शिवचरण जी ने हमेशा के लिए अपनी आँखें मूँद लीं, तो आश्रम के संचालक ने भारी मन से तीनों बेटियों को फोन मिलाया।
"पापा अब नहीं रहे, बेटी... अंतिम दर्शन के लिए आ जाओ," संचालक ने मुंबई वाली बड़ी बेटी से कहा।
उधर से कुछ सेकंड की खामोशी के बाद जवाब आया, "अंकल, अभी स्कूल का एग्ज़ाम सेशन चल रहा है, छुट्टी मिलना नामुमकिन है। आप ही अंतिम संस्कार करवा दीजिए। मैंने आपके अकाउंट में ऑनलाइन 5100 रुपये ट्रांसफर कर दिए हैं, कफ़न और बाकी सामान का इंतज़ाम कर लीजिएगा।"
नेपाल वाली बेटी से बात हुई, तो उसने कहा, "मेरा आना संभव नहीं है, आप जब मुखाग्नि दें तो वीडियो कॉल कर लीजिएगा, मैं ऑनलाइन देख लूँगी।" आजमगढ़ वाली बेटी ने तो इतना कष्ट भी नहीं उठाया कि फोन पर ज़्यादा बात करे।
आश्रम के संचालक का हाथ काँप गया। जिस पिता ने तीन बेटियों की उंगलियाँ पकड़कर उन्हें इस काबिल बनाया कि वे समाज को संस्कार और ज्ञान बाँट सकें, आज वही बेटियाँ अपने पिता की अंतिम यात्रा में कांधा देने के बजाय कुछ रुपयों की डिजिटल रसीद और एक वीडियो कॉल का सौदा कर रही थीं।
शाम को जब ककरोई गाँव के श्मशान घाट पर शिवचरण जी की देह लाई गई, तो उन्हें कांधा देने के लिए कोई खून का रिश्ता मौजूद नहीं था। गाँव के कुछ समाजसेवियों और आश्रम के कर्मचारियों ने मिलकर उन्हें कांधा दिया।
चिता की लपटें उठ रही थीं और एक कोने में खड़ा आश्रम का एक कर्मचारी अपने मोबाइल स्क्रीन पर नेपाल वाली बेटी को लाइव वीडियो कॉल दिखा रहा था।
धुएँ के बीच से जलती चिता को देखकर श्मशान में खड़े हर व्यक्ति की आँखें नम थीं, पर आँखों में सिर्फ़ शोक नहीं था—एक गहरा सन्नाटा और सवाल था।
शिवचरण जी तो चले गए, पर पीछे छोड़ गए एक जलता हुआ सवाल—क्या यही वो शिक्षा है जो समाज के भावी कर्णधारों को दी जा रही है? क्या तरक्की की दौड़ में रिश्ते इतने सस्ते हो गए हैं कि पिता का अंतिम संस्कार भी अब महज़ एक ऑनलाइन ट्रांसफर और वीडियो कॉल का जरिया बनकर रह गया है?

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