'गटर जनरेशन' से 'सीधे गोली चलवाने' तक: लोकतंत्र और छात्र आंदोलनों पर हेट स्पीच का हमला !

 





कंगना रनौत छात्रों को 'गटर जनरेशन', 'गटर छाप', 'गंदगी' और 'बदसूरत' कहकर संबोधित किया था। 

लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति, विरोध और आंदोलन जनता के मौलिक अधिकार हैं। जंतर-मंतर पर नीट (NEET) पेपर लीक मामले के खिलाफ छात्रों द्वारा किया गया प्रदर्शन देश की शिक्षा व्यवस्था की कमियों और युवाओं के भविष्य से जुड़ा एक न्यायसंगत सवाल था। हालांकि, इस जायज नाराजगी का समाधान निकालने या संवाद स्थापित करने के बजाय, सत्ता पक्ष से जुड़े जनप्रतिनिधियों और विचारकों द्वारा जिस तरह की अमर्यादित, आपत्तिजनक और हिंसक भाषा का प्रयोग किया गया, वह लोकतांत्रिक गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

1. कंगना रनौत द्वारा छात्रों का अमानवीकरण

भाजपा सांसद व अभिनेत्री कंगना रनौत द्वारा संसद परिसर और सोशल मीडिया पर आंदोलनकारी छात्रों के खिलाफ इस्तेमाल की गई भाषा केवल अभद्र नहीं, बल्कि युवाओं की गरिमा पर सीधा हमला है। आलेख के अनुसार उनके द्वारा दिए गए प्रमुख आपत्तिजनक व नफरती बयान निम्नलिखित हैं:

आंदोलनकारी छात्रों को 'गटर जनरेशन', 'गटर छाप', 'गंदगी' और 'बदसूरत' कहकर संबोधित करना।

जंतर-मंतर आंदोलन के वीडियो देखकर 'उबकाई आने' की बात कहना।

पूरे प्रदर्शन को 'कचरा तथा भद्देपन का प्रदर्शन' करार देना।

युवाओं की बौद्धिक क्षमता का उपहास उड़ाते हुए यह दावा करना कि प्रदर्शनकारियों को 'नीट का फुल फॉर्म भी नहीं पता होगा'।

जब एक जनप्रतिनिधि अपने देश के ही हक मांग रहे युवाओं को 'गटर' और 'कचरा' जैसे शब्दों से अमानवीय घोषित करने लगे, तो यह लोकतांत्रिक संवाद की समाप्ति और सत्ता के अहंकार का प्रतीक बन जाता है।

2. टीजी मोहनदास की खुलेआम हिंसक धमकी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े दक्षिणपंथी विचारक, भाजपा के राज्य बौद्धिक सेल के पूर्व प्रमुख व विश्लेषक टीजी मोहनदास द्वारा अपने यूट्यूब चैनल 'पत्रिका' पर दिए गए विचार हिंसक मानसिकता को दर्शाते हैं:

प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाते हुए दिया गया वक्तव्य: "अगर मैं जिम्मेदार (अधिकार) में होता, तो जंतर-मंतर के चार वर्ग किलोमीटर के इलाके में कर्फ्यू लगा देता। मैं लोगों से तीन बार वहां से हटने के लिए कहता और इसके बाद सीधे गोली चलवा देता। कुछ लोग भाग जाते, कुछ मर जाते, कुछ बच जाते और चार घंटे के भीतर स्थिति शांत हो जाती।"

लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर 'सीधे गोली चलवा देने' और 'लोगों के मर जाने' जैसी बातें करना स्पष्ट रूप से हिंसा को बढ़ावा देने वाली 'हेट स्पीच' की श्रेणी में आता है। यद्यपि विवाद बढ़ने पर संघ ने आधिकारिक तौर पर उनके बयानों से दूरी बनाई, लेकिन इस तरह की हिंसक सोच का सार्वजनिक मंचों पर बेखौफ व्यक्त होना समाज के लिए चिंताजनक है।

गोदी मीडिया और सत्ता समर्थकों द्वारा हक मांग रहे छात्रों को 'चीन द्वारा फंडिंग प्राप्त' या 'राष्ट्रविरोधी' साबित करने की होड़ तथा जनप्रतिनिधियों द्वारा अभद्र भाषा व हिंसक बयानों का सहारा लेना इस बात का प्रमाण है कि असहमति को दबाने के लिए राष्ट्रवाद का अनुचित उपयोग किया जा रहा है।

जब तक सत्ता और उसके समर्थक चाटुकारिता को ही देशभक्ति मानते रहेंगे और राष्ट्रवाद के प्रमाण पत्र बांटते रहेंगे, तब तक लोकतंत्र में संवाद की गुंजाइश खत्म होती रहेगी। छात्रों और युवाओं के जायज सवालों का जवाब हिंसक धमकियों या गाली-गलौज से नहीं, बल्कि जवाबदेही और संवेदनशीलता से दिया जाना चाहिए।

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