ईमानदार होने की कीमत: व्यवस्था की बलि चढ़े EO विमल कुमार!

 




"सच्चाई की राह पर चलना अब मुफ़्त  नहीं रहा, यहाँ ईमानदारी की कीमत जान देकर चुकानी पड़ती है।"

यह महज़ एक पंक्ति नहीं, बल्कि उस कड़वे सच का बयान है जो आज हमारी व्यवस्था की नसों में ज़हर बनकर दौड़ रहा है। ईओ (कार्यपालक पदाधिकारी) विमल कुमार की हत्या ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सत्ता के संरक्षण में पलते 'सफ़ेदपोश रावणों' के आगे जनता का जनसेवक कितना असुरक्षित है।

मृतक विमल कुमार की पत्नी बबीता विमल के बेबस, बिलखते आँसू अब सिर्फ एक परिवार का मातम नहीं हैं, बल्कि वे सुशासन के दावों के चेहरे पर ज़ोरदार तमाचा हैं। बबीता जी का सीधा और गंभीर आरोप है कि डेहरी के विधायक सोनू सिंह द्वारा उनके पति से 50 लाख रुपये की रंगदारी माँगी जा रही थी। और जब एक ईमानदार अधिकारी ने इस अवैध उगाहने के खेल में झुकने से इंकार कर दिया, तो उसकी कीमत अपनी ज़िंदगी देकर चुकानी पड़ी।

कहाँ गया वो 'बड़बोलापन' और 'पिंडदान' के खोखले वादे?

जनता को याद है सरकार के शीर्ष पर बैठे नुमाइंदों का वो बुलंद भाषण—

"अपराधी या तो नेपाल भागेंगे या गया में उनका पिंडदान होगा... गंगा मैया गोद में लेने के लिए बाहें फैलाए खड़ी हैं।"

आज बिहार की जनता पूछती है—अब किसका पिंडदान करेंगे?

जब ज़ुल्म का उँगली-निशाना सत्ताधारी एनडीए (NDA) के अपने ही विधायक पर उठ रहा हो, तब क्या गंगा मैया की बाहें सिर्फ आम जनता और अपराधियों के अंतर को ढकने के लिए सिमट जाती हैं? क्या क़ानून की आँखें तब मूंद ली जाती हैं जब आरोपी अपनी ही सत्ता की कुर्सी का पाया हो?

चुनिंदा कार्रवाई और बढ़ता अपराधियों का मनोबल

जब सरकार की मंशा क़ानून का राज स्थापित करने के बजाय किसी धर्म, जाति या वर्ग विशेष को टारगेट करने की बन जाती है, तब असल अपराधियों का मनोबल बुलंद होना स्वाभाविक है। जब सत्ता का संरक्षण उन्हें यह विश्वास दिला देता है कि "हम अपने हैं, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता", तो ऐसे कुशासित माहौल में अपराधी खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करने लगते हैं।

क्या सरकार इस मामले में निष्पक्ष गिरफ्तारी करवाएगी?

क्या आरोपी विधायक पर स्पीडी ट्रायल  चलाकर मिसाल कायम की जाएगी?

शायद नहीं। क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब-जब कुर्सी और इंसाफ़ के बीच चुनाव करना पड़ा है, सत्ता ने अपनी गद्दी की सुरक्षा को जनता की सुरक्षा से ऊपर रखा है।

खौफ के साए में घुटती जनता

आज आम इंसान और ईमानदार अफ़सर खौफ़ और भय के माहौल में जीने को मजबूर हैं। विमल कुमार की हत्या कोई पहली घटना नहीं है, लेकिन यह इस बात का नग्न प्रमाण है कि यदि आप भ्रष्ट व्यवस्था के आगे नहीं झुकेंगे, तो यह तंत्र आपको मिटा देगा।

यदि आज भी बबीता विमल के चीत्कार से सत्ता में बैठे हुक्मरानों की ज़मीर नहीं जागती, यदि आज भी न्याय की जगह 'कुर्सी बचाने की राजनीति' होती है, तो यह मान लेना चाहिए कि यह तंत्र अब सिर्फ अपराधियों द्वारा, अपराधियों के लिए ही चलाया जा रहा है।

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