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भावपूर्ण श्रद्धांजलि ।। ​अपूरणीय क्षति: फरीदपुर ने खोया एक समर्पित जननेता !

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     नहीं रहे संजू यादव!  ​आज फरीदपुर सहित पूरे राजद (राष्ट्रीय जनता दल) परिवार के लिए एक अत्यंत दुखद और स्तब्ध कर देने वाली खबर सामने आई है। फरीदपुर के कर्मठ, जुझारू और लोकप्रिय राजद नेता संजू यादव जी का आज शाम अचानक दिल का दौरा पड़ने से असामयिक निधन हो गया। इस हृदयविदारक समाचार से संपूर्ण क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है। जिसने भी यह सुना, वह अपनी सुध-बुध खो बैठा; हर आंख नम है और हर दिल भारी है। ​दल और जनता के लिए आजीवन समर्पित ​संजू यादव जी केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता या नेता नहीं थे, बल्कि वे जनता के सच्चे सेवक थे। राष्ट्रीय जनता दल की नीतियों और सिद्धांतों के प्रति उनकी निष्ठा अटूट थी। ​आजीवन समर्पण: उन्होंने अपने जीवन का क्षण-क्षण दल की मजबूती और समाज के दबे-कुचले, शोषित वर्गों की आवाज बुलंद करने में लगा दिया। ​सादगी और सुलभता: फरीदपुर का हर आम और खास व्यक्ति उनके सरल स्वभाव, मिलनसारिता और हमेशा मदद के लिए तत्पर रहने के अंदाज का कायल था। उनका असमय चले जाना फरीदपुर की राजनीति और सामाजिक क्षेत्र के लिए एक ऐसा शून्य छोड़ गया है, जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। ​शब्दो...

डेटा दें, एआई लें !

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    ​भारत के पास एक ऐसा अमूल्य संसाधन है जिसकी अमेरिकी टेक कंपनियों को सबसे ज्यादा जरूरत है—उपयोगकर्ता डेटा !  भारत को अमेरिकी कंपनियों को अपने अत्याधुनिक एआई मॉडलों तक बिना किसी प्रतिबंध के पहुंच देने के बदले में ही अपना डेटा देना चाहिए। इसके लिए भारत 'डेटा स्थानीयकरण अधिदेश' जैसे कड़े नियमों का उपयोग एक सौदेबाजी के हथियार  के रूप में कर सकता है, ताकि भविष्य में होने वाले किसी भी तकनीकी झटके या प्रतिबंध से देश के हितों की रक्षा की जा सके।

व्यवस्था की नाकामी से उपजा बाजार! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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   अक्षमता की अर्थव्यवस्था !  भारत में बुनियादी सरकारी और सार्वजनिक सुविधाओं (बिजली, पानी, हवा, शिक्षा) की कमी ने एक नए प्रकार के बाजार को जन्म दिया है। इसे 'अक्षमता की अर्थव्यवस्था' (Inefficiency Economy) कहते हैं। यहाँ अवसर विकास से नहीं, बल्कि व्यवस्था की नाकामियों से पैदा होते हैं। ​पूरक बनाम सुधारात्मक खपत: यहाँ दो तरह के खर्चों में अंतर  हैं: ​आकांक्षी (Aspirational): जो जीवन को बेहतर बनाते हैं (जैसे रेफ्रिजरेटर या स्मार्टफोन)। ​क्षतिपूरक (Compensatory): जो किसी कमी को पूरा करने के लिए किए जाते हैं (जैसे इनवर्टर, वॉटर फिल्टर, एयर प्यूरिफायर)। ये उत्पाद असल में किसी बुनियादी विफलता (बिजली-पानी की कमी, प्रदूषण) को छिपाने का पैचवर्क (मरम्मत) मात्र हैं। ​अक्षमता की स्वीकृति और भ्रम: समय के साथ लोग इन कमियों को सामान्य मान लेते हैं। एक नए घर में इनवर्टर या प्यूरिफायर होना अब विलासिता नहीं, बल्कि मजबूरी बन चुका है। विज्ञापन और बाजार इस 'मरम्मत' को एक 'अपग्रेड' या प्रगति के रूप में बेचते हैं, जिससे हमें अपनी जेब से अतिरिक्त टैक्स जैसा महसूस नहीं होता। ​एक नई असमा...

​शिक्षा नीति और भाषा का बोझ: क्या तीन भाषाओं का फॉर्मूला सही है?

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     शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में आती है। ​शिक्षा का उद्देश्य छात्रों का मानसिक विकास करना और उन्हें भविष्य के लिए तैयार करना है, न कि उन पर अनावश्यक मानसिक दबाव डालना। हाल ही में सीबीएसई (CBSE) द्वारा कक्षा 9 और 10 के लिए 3-भाषा फॉर्मूला लागू करने के फैसले ने एक नई बहस छेड़ दी है। क्या बिना सोचे-समझे नीतियां थोपना हमारे देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है? आइए इस नीति के विभिन्न पहलुओं और इसकी कमियों को समझने की कोशिश करते हैं। ​1. छात्रों पर बढ़ता अकादमिक बोझ और बुनियादी कमियां ​कक्षा 9 और 10 के छात्र पहले से ही बोर्ड परीक्षाओं और बढ़ते पाठ्यक्रम के भारी दबाव से जूझ रहे हैं। ऐसे नाजुक मोड़ पर अचानक एक अतिरिक्त भाषा का बोझ डालना व्यावहारिक नहीं है। ​किसी भी नई भाषा को सीखने के लिए समय, निरंतरता और सही उम्र के अनुकूल तरीकों की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, देश के अधिकांश स्कूल पहले से ही योग्य भाषा शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। बिना तैयारी के इस तरह का कदम उठाना दूरदर्शिता की कमी को दर्शाता है। यही कारण है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने भी इस कदम के खिलाफ एक जनहित याचिका...

एलन मस्क दुनिया का पहला 'खरबपति' (Trillionaire) बने!

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       हालिया आर्थिक बदलावों और तकनीकी क्रांति ने वैश्विक स्तर पर धन सृजन के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। एलन मस्क का दुनिया का पहला 'खरबपति' बनना केवल एक व्यक्ति की कामयाबी नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि वैश्विक पूंजीवाद का रुख अब पारंपरिक उद्योगों से हटकर भविष्य की अति-आधुनिक तकनीकों की ओर हो चुका है। ​मस्क की संपत्ति में यह अभूतपूर्व उछाल मुख्य रूप से अंतरिक्ष में बस्तियाँ बसाने उन्नत रोबोटिक्स , और टिकाऊ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में उनके दूरदर्शी निवेश का परिणाम है। यह विकास दिखाता है कि आने वाले समय में दुनिया के सबसे अमीर देश और व्यक्ति वे नहीं होंगे जो केवल पारंपरिक विनिर्माण या सेवाओं पर निर्भर हैं, बल्कि वे होंगे जो कल्पना को मूर्त संपत्तियों में बदलने की क्षमता रखते हैं। यह उपलब्धि धन और प्रगति की आकांक्षाओं को पुनर्परिभाषित करती है, जहाँ जोखिम लेने की असीमित क्षमता ही नए आर्थिक साम्राज्यों की नींव रख रही है। ​वैश्विक स्तर पर जब संपत्ति के नए शिखर छुए जा रहे हैं, तब भारत भी एक बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक मोड़ पर खड़ा है। भारत वर्तमान में दुनिया की सबस...

आस्था की मंडी और आधुनिक 'चंदा-चोर'! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​— धर्म के ठेकेदारों और आधुनिक परजीवियों पर एक तीखा प्रहार ​आज के दौर में यदि व्यंग्य के पुरोधा हरिशंकर परसाई जीवित होते, तो वे निश्चित रूप से 'लंका विजय' के बाद की अराजकता जैसी ही एक नई कालजयी कहानी लिखते—"राम मंदिर और आधुनिक कुबेरों की लीला"। वर्तमान परिदृश्य कुछ ऐसा ही है, जहाँ आस्था की पवित्र भूमि पर कुछ लोग अपनी तिजोरियाँ भरने के व्यापार में लीन हैं। ​पाहन पूजे हरि मिले... और बदलती नीतियां ​कबीरदास ने सदियों पहले जिस पाखंड पर चोट करते हुए कहा था, "पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजूँ पहार", आज के 'चंदा-चोरों' ने उस पंक्ति का बिल्कुल नया और व्यावहारिक अर्थ निकाल लिया है। उन्हें न तो पाप का भय है और न ही पुण्य की लालसा; उनका एकमात्र ध्येय श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को अपनी व्यक्तिगत तिजोरी का रास्ता बनाना है। ​दानकर्ता का संशय: डरा हुआ आज वह निष्कपट भक्त (दानकर्ता) है, जो अपनी गाढ़ी कमाई का अंश भगवान के चरणों में सौंपता है। ​परजीवियों का वर्चस्व: दूसरी ओर, वे शातिर लोग हैं जो पाखंड के इस आधुनिक खेल में पूरी तरह निश्चिंत हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि...

'ईवीएम' स्वाहा: न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी!

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     ​लपटों में लोकतंत्र का 'सन्दूक'! यह आधुनिक युग का 'लाक्षागृह' था।  ​जिस चुनावी प्रक्रिया पर विपक्षी दल पहले से ही अपनी सुरीली तान में उंगलियां उठा रहे थे, वहां अचानक एक ऐसा 'क्लाइमेक्स' आया कि सुर और साज दोनों ही खाक हो गए। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव बीते अभी जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी नहीं हुए थे कि कोलकाता की एक सरकारी इमारत की ऊपरी मंजिलों पर रखी करीब चार हजार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें (EVMs) जलकर खाक हो गईं। इसे कहते हैं मुकम्मल इलाज—"न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।" जब मशीनें ही नहीं बचेंगी, तो जांच किस बात की होगी और उंगलियां किस पर उठेंगी? ​हाई-सिक्योरिटी वाली 'अग्निपरीक्षा' ​बड़ा ही दिलचस्प विरोधाभास है! ये मशीनें किसी मामूली कबाड़खाने में नहीं, बल्कि 'उच्च सुरक्षा क्षेत्र' (High-Security Zone) में रखी गई थीं। पर आग भी बड़ी समझदार निकली; तीसरी मंजिल से लगी और सीधे छलांग मारते हुए सातवीं-आठवीं मंजिल पर पहुंच गई—ठीक वहीं, जहां ईवीएम आराम फरमा रही थीं। विपक्षी दल अब इसमें 'साजिश की बू' सूंघ रहे हैं, पर असल में यह तो आधु...