भारत में अंग्रेजी: औपनिवेशिक विरासत से अपनी भाषा बनने तक का सफर !
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक टिप्पणी के बाद यह बहस पुनः छिड़ गई है कि क्या अंग्रेजी को भारत की एक देशीय या स्थानीय भाषा (Indigenous Language) माना जा सकता है। भारत में भाषाओं के संदर्भ में अक्सर "अंग्रेजी बनाम भारतीय भाषाएं" का एक कृत्रिम द्वंद्व खड़ा किया जाता है, जो ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से निरर्थक है।
हिंदी, तमिल, तेलुगु, उड़िया, कन्नड़ या मराठी जैसी भारतीय भाषाओं का विकास अंग्रेजी का बहिष्कार करके नहीं किया जा सकता। भारत का भाषाई भविष्य बहुभाषावाद (Multilingualism) को पोषित करने में निहित है। यद्यपि अंग्रेजी ऐतिहासिक अर्थों में संस्कृत या तमिल की तरह प्राचीन देशीय भाषा नहीं है, फिर भी दो शताब्दियों से अधिक के प्रयोग के बाद इसने भारत से जुड़ने और अपना स्थान बनाने का पूर्ण नैतिक व व्यावहारिक अधिकार प्राप्त कर लिया है।
अंग्रेजी की शुरुआत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को चलाने, व्यापार और प्रशासनिक कार्यों को आसान बनाने के लिए हुई थी। शुरुआती दौर में इसने अंग्रेजों के हितों की पूर्ति की, लेकिन भाषाएं अपने आगमन की परिस्थितियों की गुलाम नहीं रहतीं। भारतीयों ने अंग्रेजी को अपनाया, उसका रूपांतरण किया और उसे औपनिवेशिक हितों के बजाय भारतीय आकांक्षाओं को व्यक्त करने का माध्यम बना दिया:
राजा राममोहन राय (1823): इन्होंने कलकत्ता में प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अंग्रेजी में याचिकाएं दायर कीं।
दादाभाई नौरोजी: अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'ड्रेन थ्योरी' (Drain Theory) के माध्यम से अंग्रेजों द्वारा भारत के आर्थिक शोषण का पर्दाफाश अंग्रेजी में ही किया।
स्वामी विवेकानंद (1897): अपने प्रसिद्ध व्याख्यान 'माई प्लान ऑफ कैंपेन' के जरिए भारतीय अध्यात्म और चिंतन को अंग्रेजी में विश्व के सामने रखा।
महात्मा गांधी: उन्होंने अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' का स्वयं अंग्रेजी अनुवाद किया, ताकि भारतीय विचारों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पहुँचाया जा सके।
स्वतंत्रता के बाद, संविधान सभा (के.एम. मुंशी और एन. गोपालस्वामी अय्यंगार द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव) ने एक व्यावहारिक रास्ता चुना—हिंदी को संघ की आधिकारिक भाषा (Official Language) घोषित किया गया और अंग्रेजी को आधिकारिक व न्यायिक कार्यों के लिए बनाए रखा गया।
समय के साथ, अंग्रेजी भारत की न्यायपालिका, विधायिका, प्रशासन और उच्च शिक्षा का प्रमुख माध्यम बन गई। साहित्य अकादमी ने भी अंग्रेजी को भारत की साहित्यिक भाषाओं में से एक के रूप में मान्यता दी है। आर.के. नारायण, मुल्क राज आनंद, अमिताभ घोष और विक्रम सेठ जैसे लेखकों ने यह साबित कर दिया कि भारतीय अनुभवों, विविधताओं और सांस्कृतिक बारीकियों को अंग्रेजी में भी उतनी ही प्रामाणिकता के साथ व्यक्त किया जा सकता है।
यह धारणा गलत है कि अंग्रेजी भारत में केवल एक छोटे एलीट (Elite) वर्ग तक सीमित है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 12.9 करोड़ (129 मिलियन) लोग अंग्रेजी को पहली, दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में बोलते थे, जिसने भारत को विश्व के सबसे बड़े अंग्रेजी भाषी देशों में खड़ा कर दिया:
2,60,000 लोग: अंग्रेजी को अपनी पहली/मातृभाषा मानते हैं।
8.3 करोड़ (83 मिलियन) लोग: इसे अपनी दूसरी भाषा के रूप में उपयोग करते हैं।
4.6 करोड़ (46 मिलियन) लोग: इसे तीसरी भाषा के रूप में बोलते हैं।
पिछले एक दशक में अंग्रेजी माध्यम शिक्षा के तीव्र विस्तार से अंग्रेजी का व्यावहारिक ज्ञान रखने वालों की संख्या 18 करोड़ से 25 करोड़ तक पहुँच चुकी है।
सीबीएसई (CBSE) के लगभग 31,000 और सीआईएससीई (CISCE) के 3,000 से अधिक स्कूल अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा प्रदान करते हैं। इसके अलावा, भारत के लगभग सभी प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थान अंग्रेजी माध्यम से ही संचालित होते हैं।
कवि वी.के. गोकाक और ए.के. रामानुजन की रचनाओं में बताया गया है कि कैसे अंग्रेजी शब्द दूर की सीमाओं से आकर भारत की मिट्टी में रोपे गए और अब वे यहीं के फल-फूल बन चुके हैं।
प्रसिद्ध लेखक राजा राव ने 1938 में अपने उपन्यास 'कांथापुरा' की भूमिका में लिखा था कि जैसे कनाडा या ऑस्ट्रेलिया ने अंग्रेजी का अपना स्वरूप विकसित किया, वैसे ही भारत भी अपनी पहचान वाली अंग्रेजी का निर्माण करेगा—जिसका अपना उच्चारण, मुहावरे और सांस्कृतिक संवेदनाएं होंगी। आज यह बात पूरी तरह सच साबित हो चुकी है।
यह सवाल अब गौण है कि अंग्रेजी भारत की देशीय भाषा है या नहीं। महत्वपूर्ण सत्य यह है कि इतिहास, साहित्य, संवैधानिक व्यवस्था और दैनिक व्यवहार के जरिए अंग्रेजी ने भारत की अपनी आधुनिक भाषाओं में से एक बनने का हक अर्जित कर लिया है।
अंग्रेजी अब केवल औपनिवेशिक शासकों की भाषा नहीं रही; यह एक ऐसी भाषा बन चुकी है जिसमें भारतीय बोलते हैं, सोचते हैं और अपनी पहचान गढ़ते हैं। यह हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि भारतीयों को आपस में और पूरी दुनिया से जोड़ने वाला एक ऐतिहासिक पुल है।

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