डिजिटल युग में किशोर मन, अभिभावकों का दायित्व और कानून पर विश्वास: एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण — प्रो. प्रसिद्ध कुमार।

   



हाल ही में दानापुर/खगौल क्षेत्र से लापता हुई स्कूली छात्रा की महज 36 घंटे के भीतर पुलिस द्वारा की गई सकुशल बरामदगी न केवल एक राहत की खबर है, बल्कि यह वर्तमान समाज, परिवार और किशोर-मनोविज्ञान के संदर्भ में कई गंभीर पहलुओं पर सोचने के लिए हमें मजबूर करती है।

इस उत्कृष्ट एवं त्वरित कार्रवाई के लिए मैं दानापुर ए.एस.पी., खगौल थाना प्रभारी एवं एस.आई.टी. (SIT) की पूरी पुलिस टीम को हार्दिक बधाई व साधुवाद देता हूँ। अत्याधुनिक तकनीकी सहायता और पुलिस की उत्कृष्ट कार्यकुशलता के बल पर ली गई यह त्वरित कार्रवाई अत्यंत सराहनीय है।

लेकिन एक समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक के रूप में इस घटना के पीछे छिपे बाल मनोविज्ञान  और सामाजिक मनोविज्ञान के धागों को समझना बेहद जरूरी है।

1. बाल मनोविज्ञान: 'डिजिटल भटकाव' और किशोरावस्था की संवेदनशीलता

किशोरावस्था (Adolescence) जीवन का वह पड़ाव है जहाँ मस्तिष्क का निर्णय लेने वाला भाग पूरी तरह विकसित नहीं होता, जबकि भावनाएँ और जिज्ञासाएँ चरम पर होती हैं।

प्रलोभन और छद्म आत्मीयता: सोशल मीडिया (जैसे इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप आदि) के जरिए अज्ञात लोगों से दोस्ती होना और उनके बहकावे में आ जाना किशोरावस्था की एक सहज मनोवैज्ञानिक कमजोरी का परिणाम है। इस उम्र में बच्चे लोभ-लालच, फैंटेसी और नकली सहानुभूति को वास्तविक समझ बैठते हैं।

अभिभावकीय डिजिटल निगरानी बाल मनोविज्ञान यह स्पष्ट कहता है कि अवयस्क (Minors) को बिना किसी निगरानी के स्मार्टफोन सौंपना जोखिम भरा है। यदि पढ़ाई या जरूरत के लिए मोबाइल देना भी पड़े, तो अभिभावकों को यह जानना आवश्यक है कि बच्चा किससे बात कर रहा है, उसकी चैट में कौन लोग शामिल हैं और उसकी ऑनलाइन गतिविधि कैसी है। यह बच्चे की स्वतंत्रता पर हमला नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा के लिए एक आवश्यक अभिभावकीय ढाल है।

2. सामाजिक मनोविज्ञान: जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति और पुलिस-प्रशासन पर विश्वास

जब ऐसी कोई अप्रिय घटना घटती है, तब अक्सर समाज में दो प्रकार की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलती हैं:

आरोप-प्रत्यारोप और जिम्मेदारी से बचना: माता-पिता और समाज अक्सर अपनी निगरानी की कमियों को स्वीकार करने के बजाय सारा दोष तुरंत पुलिस-प्रशासन पर मढ़ देते हैं। जबकि सच यह है कि पहली सुरक्षा रेखा 'घर' होती है। अभिभावक अपनी सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुँह नहीं मोड़ सकते।

भीड़तंत्र व उग्रता बनाम संयम और न्याय: संकट की स्थिति में अफवाहें तेजी से फैलती हैं और असामाजिक तत्व जन-आक्रोश का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। सामाजिक मनोविज्ञान के अनुसार, ऐसी स्थिति में उग्र होना या हिंसात्मक कदम उठाना समाज और व्यवस्था दोनों को अपूरणीय क्षति पहुँचाता है।

संयम और कानून पर भरोसा ही न्याय का मार्ग है

खगौल की इस घटना ने यह साबित किया है कि पैनिक (घबराहट) फैलाने या उग्र होने के बजाय यदि धैर्य, संयम और पुलिस-प्रशासन पर पूर्ण भरोसा रखा जाए, तो परिणाम सकारात्मक आते हैं।

पुलिस की त्वरित कार्रवाई और तकनीकी दक्षता ने एक मासूम का भविष्य सुरक्षित किया। अब हमारा दायित्व है कि हम अपने घरों में बच्चों के साथ संवाद का माहौल बनाएँ, उनकी डिजिटल गतिविधियों पर प्यार और सतर्कता के साथ नज़र रखें और संकट के समय प्रशासन का सहयोग करें।

उत्कृष्ट एवं साहसिक कार्य के लिए पूरी पुलिस टीम को पुनः बधाई!

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