थाली से गायब होता संतुलन: खाद्य महंगाई की मार और बेहाल मध्यवर्ग!
भारतीय रसोई पर इन दिनों आर्थिक अनिश्चितता का संकट मंडरा रहा है। बाजार में पिछले कुछ महीनों से चीनी, चावल और खाद्य तेल जैसी अनिवार्य वस्तुओं की कीमतों में आया उछाल अब कोई सामान्य मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक महंगाई का रूप ले चुका है।
खुदरा बाजारों में चीनी का 60 से 65 रुपये प्रति किलो, सरसों और अन्य खाद्य तेलों का 200 से 220 रुपये प्रति लीटर, और अच्छी गुणवत्ता वाले चावल का 75 से 80रुपये प्रति किलो तक पहुंचना सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि आम आदमी के दैनिक बजट की नींव हिल चुकी है।
आंकड़ों के नजरिए से देखें तो राष्ट्रीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी लगभग 39% से 45% के बीच है। जब खाद्यान्न और खाद्य तेल महंगे होते हैं, तो उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) तेजी से ऊपर भागता है।
भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण खाद्य तेल 200 रुपये प्रति लीटर के आंकड़े को पार कर रहे हैं।
अनियमित मानसून, जलवायु परिवर्तन और उत्पादन लागत में बढ़ोतरी के कारण चीनी और चावल के दामों में लगातार तेजी बनी हुई है।
आधिकारिक आंकड़ों में मुख्य मुद्रास्फीति भले ही नियंत्रण में दिखे, लेकिन फ़ूड इन्फ्लेशन सीधे तौर पर आम नागरिक की क्रय शक्ति को कम कर देता है।
आम परिवारों की कुल आय का एक बड़ा हिस्सा (40% से 60%) केवल भोजन और दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर खर्च होता है।
आय स्थिर रहने और आवश्यक वस्तुओं के महंगे होने से परिवारों के पास शिक्षा, स्वास्थ्य और बचत जैसी प्राथमिकताओं के लिए बजट नहीं बच रहा है।
महंगाई के इस दौर को केवल अंतरराष्ट्रीय कारणों का हवाला देकर खारिज नहीं किया जा सकता:
1. आपूर्ति प्रबंधन की कमी: सरकार के पास बफर स्टॉक होने के बावजूद खुदरा बाजार तक उचित मूल्य पर रसद पहुंचाने की नीतियां पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रही हैं।
2. बिचौलियों और जमाखोरी पर ढील: कृषि उपज से लेकर खुदरा विक्रेता तक पहुंचने के बीच जमाखोरी और मध्यस्थों का मुनाफा कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ा देता है।
3. ईंधन की उच्च दरें: परिवहन लागत ऊंची बनी रहने के कारण हर आवश्यक वस्तु का अंतिम मूल्य खुद-ब-खुद बढ़ जाता है।
सरकार को केवल मौद्रिक नीतियों (जैसे RBI द्वारा ब्याज दरें बढ़ाना) पर निर्भर रहने के बजाय प्रशासकीय और आपूर्ति-पक्षीय सुधार करने होंगे। आवश्यक वस्तुओं पर शुल्क कटौती, पीडीएस का विस्तार और जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई ही आम आदमी की थाली को सुरक्षा प्रदान कर सकती है।
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