वृक्षों की गिनती में खोते जंगल: भारत की हरित नीति का वास्तविक विश्लेषण।

 




भारत में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सरकारी स्तर पर विज्ञापनों और वृक्षारोपण अभियानों की भरमार है। लेकिन क्या महज़ पौधों की गिनती से नष्ट हो रहे प्राचीन जंगलों और समृद्ध पारिस्थिकी तंत्र  की भरपाई की जा सकती है? नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ताज़ा प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट इस कड़वे सच से पर्दा उठाती है कि भारत "जंगलों को पुनर्जीवित करने" के बजाय केवल "पेड़ों की कागज़ी गिनती" में उलझकर रह गया है।

'ग्रीन इंडिया मिशन' (GIM) की शुरुआत भारत के वनों की गुणवत्ता सुधारने और पर्यावरण बहाली के महान उद्देश्यों के साथ की गई थी। यह वर्ष 2008 में घोषित जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) के आठ प्रमुख स्तंभों में से एक था। इसी मिशन के दम पर भारत ने पेरिस समझौते के तहत वर्ष 2030 तक 2.5 से 3 अरब टन अतिरिक्त कार्बन सिंक (Carbon Sink) बनाने का वैश्विक वादा किया था।

लेकिन CAG के ऑडिट ने एक दशक के रिपोर्ट कार्ड में इस योजना को लगभग पूरी तरह विफल पाया है:

वन गुणवत्ता सुधार में विफलता: 14 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले केवल 1.1 लाख हेक्टेयर (मात्र 8%) पर ही काम हो सका।

वन विस्तार का लक्ष्य: वन आवरण बढ़ाने के लक्ष्य का मात्र 4 प्रतिशत ही हासिल किया जा सका।

ग्रीन इंडिया मिशन की मूल परिकल्पना अन्य प्रमुख योजनाओं जैसे कैम्पा (CAMPA) (उद्योगों द्वारा वन भूमि हस्तांतरण पर दिया जाने वाला धन) और मनरेगा (VB-G RAM G) (ग्रामीण श्रम शक्ति) के साथ मिलकर काम करने की थी। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर यह तालमेल कभी कायम ही नहीं हो पाया। नतीजतन, ग्रीन इंडिया मिशन ठंडे बस्ते में चला गया और इसकी जगह इवेंट-आधारित पौधारोपण अभियानों ने ले ली।

वर्ष 2024 में शुरू किए गए 'एक पेड़ मां के नाम' जैसे अभियानों के तहत सरकार 140 करोड़ पौधे लगाने का दावा करती है। परंतु 'भारत राज्य वन रिपोर्ट 2023' (ISFR) आंकड़ों के पीछे की खौफनाक सच्चाई उजागर करती है:

"रिपोर्ट के अनुसार हरित आवरण  में 1,445 वर्ग किमी की वृद्धि दर्ज की गई, लेकिन इसमें से वास्तविक जंगल केवल 156 वर्ग किमी ही हैं। शेष 1,289 वर्ग किमी क्षेत्र 'दर्ज वनों से बाहर के पेड़' हैं।"

सरकारी आँकड़ों में पार्कों, सड़कों के किनारे, बागानों और खेतों की मेड़ों पर लगे पौधों को जंगल मान लिया जाता है। जबकि दर्ज वनों के भीतर, सघन वन लगातार पतले होकर झाड़ियों में तब्दील हो रहे हैं। संक्षेप में कहें तो—भारत पेड़ तो ज़्यादा लगा रहा है, लेकिन वास्तविक जंगल लगातार खो रहा है।

अरावली पर्वतमाला—जो देश की सबसे पुरानी और सबसे जर्जर पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है—इस नीतिगत विफलता का प्रत्यक्ष उदाहरण है। दशकों के खनन और अवैध कब्जों ने अरावली की पहाड़ियों को छलनी कर दिया है, और इसकी प्राकृतिक वनस्पति को आक्रामक 'विलायती कीकर' ने तबाह कर दिया है।

अब सरकार इसे 'ग्रीन वॉल' बनाकर नए पौधारोपण से बचाने का दावा कर रही है। परंतु कृत्रिम रूप से लगाए गए ये पौधे सदियों में तैयार हुए एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र का स्थान कभी नहीं ले सकते। सौंदर्यशास्त्र/लैंडस्केपिंग और पारिस्थितिक पुनर्पूंजीकरण में मौलिक अंतर होता है।

CAG का काम बही-खाते जांचना, हेक्टेयर और रुपये गिनना है; वह जीवित जंगल के मूल्य और उसकी जैव-विविधता का मूल्यांकन नहीं कर सकता। फिर भी, CAG का यह निष्कर्ष एक गंभीर चेतावनी है। यदि हम जंगलों को बचाने के स्थान पर केवल इवेंट-आधारित पौधारोपण और सांख्यिकीय बाजीगरी में उलझे रहे, तो हम पर्यावरण की उस अपूरणीय क्षति को कभी नहीं रोक पाएंगे जो हमारे जल, वायु और जैव-विविधता को निगल रही है।

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