"हिस्सों में बंटी ममता"

 




मुंशी प्रेमचंद की कहानी "बाप का हिस्सा" एक ऐसे पिता की कहानी है जिसके बेटे अपनी संपत्ति का बंटवारा तो कर लेते हैं, लेकिन पिता को एक बोझ मानकर उसे अपने बीच बांटना चाहते हैं। प्रेमचंद ने उस समय की ग्रामीण रूढ़ियों को उकेरा था, जहाँ पंचायत के हस्तक्षेप से अंततः पिता को एक बेटे के साथ रहने की जगह मिल जाती थी। यह पंचायत की सामाजिक न्याय व्यवस्था और पिता के प्रति समाज के सम्मान को दर्शाता है।

आज की परिस्थितियों में, यह कहानी और भी अधिक मार्मिक हो जाती है। अब कोई 'पंचायत' नहीं है जो बेटों को पिता की जिम्मेदारी लेने के लिए मजबूर कर सके। आज, भौतिकवाद और वैयक्तिकता ने संयुक्त परिवार की परंपरा को तोड़ दिया है। शहरीकरण और 'न्यूक्लियर' परिवार की संस्कृति में, माता-पिता अक्सर एक बाधा बन जाते हैं। संपत्ति का बंटवारा अब भी होता है, लेकिन पिता का 'हिस्सा' अक्सर संपत्ति के स्थान पर अलगाव बन जाता है।

आज का परिदृश्य:

संपत्ति के लिए संघर्ष: प्रेमचंद की कहानी में संपत्ति मुख्य मुद्दा थी। आज भी, माता-पिता की मेहनत से कमाई गई संपत्ति का बंटवारा करने के लिए बच्चे तैयार रहते हैं, लेकिन उनकी देखभाल का 'बंटवारा' कोई नहीं करना चाहता।

ओल्ड हाउस का समाधान: ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत के बजाय, अब शहरों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में 'ओल्ड हाउस' (वृद्धाश्रम) एक प्रमुख समाधान के रूप में उभर रहा है। यह एक मार्मिक विरोधाभास है—एक ओर, बच्चे आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं, दूसरी ओर, वे अपने माता-पिता को पीछे छोड़ रहे हैं।

अलगाव और उपेक्षा: प्रेमचंद की कहानी में पिता को बेटों के बीच बांटा जा रहा था। आज, वह या तो एक ओल्ड हाउस में अकेला रह जाता है या अपने ही घर में एक 'विदेशी' बनकर रह जाता है, जहां उसे भोजन और बिस्तर तो मिलता है, लेकिन प्यार और सम्मान नहीं।

अकेलेपन का बोझ: आज के वृद्धों का सबसे बड़ा बोझ उनका अकेलापन है। समाज उन्हें उपेक्षित महसूस कराता है। प्रेमचंद के समय में, कम से कम सामाजिक दबाव था, लेकिन आज का समाज व्यक्तिवादी है।

 "हृदय के ओल्ड हाउस में"

यह कहानी अब केवल संपत्ति के बंटवारे की नहीं, बल्कि रिश्तों के 'बंटवारे' और हृदय के 'अकेलेपन' की कहानी है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि जब हम संपत्ति के लिए झगड़ते हैं, तो क्या हम उस व्यक्ति के लिए भी उतना ही संघर्ष करते हैं जिसने उस संपत्ति को बनाया और हमें पाला?

आज का "बाप का हिस्सा" केवल संपत्ति में हिस्सा नहीं है, बल्कि उसके बच्चों के जीवन में, उनके प्यार में, और उनके समय में एक हिस्सा है। प्रेमचंद की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि संपत्ति तो बांटी जा सकती है, लेकिन माता-पिता का प्यार और उनकी देखभाल कभी भी 'बांटी' नहीं जा सकती। जब हम उन्हें ओल्ड हाउस में या अकेलेपन में छोड़ते हैं, तो हम वास्तव में अपने ही हृदय के ओल्ड हाउस का निर्माण करते हैं, जहाँ एक दिन हम खुद भी रह सकते हैं।







 

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