भारत-अमेरिका व्यापार संबंध: 'ट्रांसशिपमेंट' विवाद और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका असर!
हाल ही में व्हाइट हाउस द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट 'द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम' के कारण भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में नया तनाव उत्पन्न हो गया है। इस रिपोर्ट में अमेरिका ने भारत सहित 40 से अधिक देशों पर निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं का उल्लंघन करने और चीन को अमेरिकी टैरिफ से बचाने (टैरिफ चोरी) में मदद करने का आरोप लगाया है।
ट्रांसशिपमेंट स्कैम क्या है?: अमेरिका का आरोप है कि चीनी निर्यातक अपने सामान को सीधे अमेरिका भेजने के बजाय भारत, मेक्सिको, वियतनाम और यूरोपीय संघ जैसे तीसरे देशों के माध्यम से री-रूट कर रहे हैं। इन देशों में मामूली बदलाव, री-पैकेजिंग या दस्तावेज़ बदलकर सामान को अमेरिका भेजा जाता है, जिससे चीनी वस्तुओं पर लगने वाला उच्च टैरिफ बच जाता है।
रिपोर्ट में भारत को चीन के टैरिफ चोरी नेटवर्क का एक प्रमुख "सक्षमकर्ता" बताया गया है। उदाहरण के लिए, पुणे-गुजरात-चेन्नई उत्पादन बेल्ट पर चीन से पंप और कंप्रेसर घटकों को री-रूट करने का आरोप लगाया गया है।
अमेरिका का नुकसान: अमेरिकी थिंक टैंक के अनुसार, 2025 में मेक्सिको, भारत और वियतनाम के जरिए हुए ट्रांसशिपमेंट से अमेरिका को लगभग $28 बिलियन का राजस्व नुकसान हुआ है।
टैरिफ नीति की विफलता: रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि अमेरिका की उच्च टैरिफ नीति घरेलू उत्पादन बढ़ाने में पूरी तरह सफल नहीं रही। चीन से आयात $525.8 बिलियन (2017) से घटकर $327.5 बिलियन (2025) जरूर हुआ, लेकिन कुल अमेरिकी आयात बढ़ गया। चीन की तैयार वस्तुओं की जगह अन्य देशों से आने वाले आयात ने ले ली।
संभावित दंडात्मक कदम: यद्यपि अभी तक भारत पर सीधे दंडात्मक टैरिफ लागू नहीं किए गए हैं, लेकिन अमेरिकी संसद में रूस से तेल आयात और श्रम मानकों को लेकर अतिरिक्त टैरिफ/जुर्माने से जुड़े विधेयक विचाराधीन हैं।
सप्लाई चेन पर निर्भरता: भारत में इलेक्ट्रॉनिक घटकों का चीन से आयात 2015-16 के 3.3% से बढ़कर 2026-27 में लगभग 13% हो गया है। भारत अंतिम उत्पाद आयात करने के बजाय चीनी कच्चे माल व मध्यवर्ती घटकों का उपयोग करके देश में निर्माण कर रहा है।
'भारत की 'मेक इन इंडिया, फॉर द वर्ल्ड' रणनीति काफी हद तक चीन से मिलने वाले इनपुट (पुर्जों) पर निर्भर करती है। यदि अमेरिका इन इनपुट्स पर प्रतिबंध या अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो भारत में विनिर्माण लागत बढ़ जाएगी और भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में कम प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे।

Comments
Post a Comment