भारत की शैक्षिक प्रगति और समावेशी समानता की चुनौती!
यूडीआईएसई+ (UDISE+) 2025-26 की हालिया रिपोर्ट भारत के स्कूली शिक्षा तंत्र में नामांकन, छात्र ठहराव, बुनियादी ढांचे और शिक्षक उपलब्धता जैसे मापदंडों पर उल्लेखनीय प्रगति दर्शाती है। हालांकि, इस समग्र विकास के साथ-साथ राज्यों, क्षेत्रों और सामाजिक समूहों के बीच असमानता की एक गहरी खाई भी मौजूद है।
नामांकन और सामाजिक संरचना: राष्ट्रीय स्तर पर सकल नामांकन अनुपात (GER) में सामान्य वर्ग (27%), ओबीसी (49%), अनुसूचित जाति (17%) और अनुसूचित जनजाति (10%) का योगदान है। आंध्र प्रदेश आधार सीडिंग में 99.6% के साथ सबसे आगे है। चंडीगढ़ और दिल्ली में सामान्य वर्ग, लद्दाख व मेघालय में एसटी, और पंजाब में एससी छात्रों का नामांकन सर्वाधिक है।
छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR): माध्यमिक स्तर पर झारखंड में सबसे अधिक पीटीआर (43) है जो शिक्षकों पर अत्यधिक कार्यभार को दर्शाता है, जबकि सिक्किम में यह सबसे कम (6) है।
स्कूल छोड़ने की दर (Dropout Rate): प्राथमिक स्तर पर बिहार में सबसे अधिक ड्रॉपआउट दर (7.9%) दर्ज की गई है, जबकि माध्यमिक स्तर पर लद्दाख (14.8%) शीर्ष पर है। इसके विपरीत पश्चिम बंगाल और तेलंगाना में ड्रॉपआउट दर काफी कम है।
लैंगिक और अल्पसंख्यक स्थिति: अधिकांश राज्यों में लड़कों की तुलना में लड़कियों की भागीदारी और नामांकन दर बेहतर हुई है। साथ ही, कुल नामांकन में अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों की हिस्सेदारी 20% से अधिक है।
पहाड़ी, दूरस्थ, जनजातीय और सीमावर्ती क्षेत्रों जैसे उत्तराखंड के बागेश्वर या ओडिशा के कंधमाल में बच्चों को आज भी स्कूल तक नियमित पहुंच, परिवहन सुविधा और डिजिटल संसाधनों की कमी से जूझना पड़ता है। इसके अलावा, ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में विषय-विशेष शिक्षकों की भारी कमी है। दिव्यांग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सुलभ बुनियादी ढांचे और समावेशी शिक्षण वातावरण की अनुपलब्धता एक बड़ी बाधा बनी हुई है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के उद्देश्यों के अनुरूप, भारत में शैक्षिक विकास को संतुलित बनाने के लिए लक्षित निवेश की आवश्यकता है:
शैक्षणिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में निवेश: दूरस्थ और बुनियादी रूप से कमजोर जिलों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और परिवहन व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
शिक्षकों का न्यायसंगत वितरण: उच्च पीटीआर वाले राज्यों और ग्रामीण क्षेत्रों में योग्य शिक्षकों की पारदर्शी और न्यायसंगत तैनाती सुनिश्चित हो।
समावेशी ढांचा: दिव्यांग बच्चों के लिए सुलभ कक्षाएं और विशेष सहायता प्रणालियां विकसित की जाएं।
केवल आंकड़ों में बढ़त ही पर्याप्त नहीं है; दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए गुणवत्तापूर्ण, सुलभ और न्यायसंगत शिक्षा की गारंटी देना ही समय की मांग है।

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