सड़क से सन्नाटे तक: महंगाई, जन-आक्रोश और लोकतंत्र में गायब होते सवाल!

 




"रोको महंगाई, बांधो दाम! नहीं तो होगा जाम।" और "खा गई चीनी, पी गई तेल... यह देखो सरकार का खेल।"

एक दौर था जब ये नारे सिर्फ राजनीतिक पार्टियों के पोस्टरों पर नहीं, बल्कि आम जनता की ज़ुबान और सड़कों की हवाओं में गूंजते थे। जब राशन की दुकानों पर बढ़ती कीमतें सीधे संसद को हिला देती थीं। लेकिन आज जब महंगाई के आंकड़े लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं, तब यह राजनीतिक और सामाजिक सन्नाटा कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

क्या जनता अब आवाज़ नहीं उठाती?

इस सन्नाटे के पीछे केवल एक वजह नहीं है, बल्कि यह कई सामाजिक और राजनीतिक बदलावों का मिला-जुला नतीजा है:

कार्रवाई का डर और 'टैग' लगने की आशंका: आज के दौर में सरकार या उसकी नीतियों पर सवाल उठाना जोखिम भरा मान लिया जाता है। किसी नीतिगत विरोध या महंगाई पर पूछे गए सवाल को अक्सर विचारधारा से जोड़ दिया जाता है। 'देशद्रोही', 'शहरी नक्सल' या 'अराजक' जैसे लेबल चिपका दिए जाने का डर आम नागरिक को पीछे हटने पर मजबूर करता है।

सोशल मीडिया और राजनीतिक ध्रुवीकरण: सूचना के इस दौर में वैचारिक विभाजन गहरा हुआ है। एक बड़ा वर्ग नीतियों के गुण-दोष देखने के बजाय राजनीतिक निष्ठाओं के आधार पर अपनी राय बनाता है। इसके कारण बुनियादी मुद्दे जैसे—महंगाई, बेरोजगारी और जन-सुविधाएं—मुख्यधारा की बहस से पिछड़ जाते हैं।

संसद और विपक्ष के रुख में बदलाव: एक समय था जब 1990 के दशक में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने संसद में चीनी की बढ़ती कीमतों पर सरकार को घेरते हुए पूछा था कि "जब स्टॉक का पता था, तो समय रहते आयात क्यों नहीं किया गया?" यह लोकतंत्र की उस ताकत को दर्शाता था जहाँ विपक्ष जनता के पेट और जेब से जुड़े मुद्दों पर सरकार की जवाबदेही तय करता था। आज संसदीय बहसों का स्तर और मुद्दे दोनों बदलते दिखे हैं।

युवाओं की चेतना और लोकतांत्रिक जवाबदेही

दक्षिण एशिया से लेकर दुनिया के कई हिस्सों में हाल के दिनों में युवाओं ('जेन जी') ने बुनियादी मुद्दों और शासन व्यवस्था पर सवाल उठाकर अपनी ताकत का अहसास कराया है। यह इस बात का प्रमाण है कि जन-आक्रोश हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। जब तक भोजन, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे बुनियादी मुद्दे प्रभावित होते रहेंगे, तब तक सवाल उठाने की गुंजाइश हमेशा बची रहेगी।

लोकतंत्र की जीवंतता इस बात में है कि जनता अपनी दैनिक समस्याओं—जैसे चीनी, तेल, रसोई गैस और ईंधन की कीमतों—पर बिना किसी भय के सवाल पूछ सके। महंगाई किसी एक विचारधारा की नहीं होती, इसका असर हर वर्ग और हर नागरिक की रसोई पर पड़ता है। इसलिए, बुनियादी मुद्दों पर सवाल पूछना लोकतंत्र को कमज़ोर नहीं, बल्कि और अधिक मज़बूत बनाता है।

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