डिग्री नहीं, जज़्बा चाहिए: कर्तव्य और सकारात्मकता से संवरेगा भविष्य!
किताबी ज्ञान और डिग्रियों से किसी इंसान की योग्यता कागजों पर तो साबित हो सकती है, लेकिन जीवन के मैदान में जीत हमेशा जज़्बे और नियत से मिलती है। अगर किसी काम को करने की अंदरूनी इच्छा और जुनून न हो, तो दुनिया की बड़ी से बड़ी डिग्री भी अलमारी में रखी एक धूल खाती रसीद बनकर रह जाती है।
इंसान की सोच ही उसके माहौल का निर्माण करती है। एक कर्मठ और ऊर्जावान व्यक्ति विपरीत से विपरीत और नकारात्मक माहौल में भी उम्मीद की कोई न कोई सकारात्मक किरण ढूंढ ही लेता है। इसके विपरीत, आलसी और कामचोर इंसान हर अनुकूल व सकारात्मक माहौल में भी कमियां और नकारात्मकता खोजकर काम से भागने का बहाना बना लेते हैं।
दूसरों पर उंगली उठाना और लफ़्फ़ाज़ी (बड़ी-बड़ी बातें) करना बहुत आसान होता है, लेकिन खुद धरातल पर उतरकर अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना ही असली चरित्र की परीक्षा है। जो लोग केवल बातें बनाते हैं और अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ते हैं, वे न तो किसी के सगे हो पाते हैं और अंततः अपना ही सबसे बड़ा नुकसान कर बैठते हैं। यह समझना बेहद जरूरी है कि फल की इच्छा सबको होती है, लेकिन उस फल को उगाने के लिए पसीना बहाने की चिंता हर कोई नहीं करना चाहता।
आज हमारे शिक्षा और पठन-पाठन का स्तर गिरने का एक मुख्य कारण शिक्षण संस्थानों में हावी होती राजनीति है। जब मुख्य ध्यान पढ़ाने और सीखने के बजाय राजनीति और गुटबाज़ी पर टिक जाता है, तो इसका सीधा और घातक असर विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ता है। शिक्षा मंदिर को राजनीति का अखाड़ा बनाने से केवल आने वाली पीढ़ियों का नुकसान होता है।
अगर देश और समाज को आगे ले जाना है, तो हमें केवल डिग्रियों के पीछे भागने के बजाय अपने अंदर सेवा, कर्तव्य और निस्वार्थ कर्म का जज़्बा जगाना होगा।
"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"
— कबीर

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