विश्वास का मत: निष्पक्ष मतदाता सूची और चुनावी शुचिता की चुनौतियाँ !
सफ़ाई और पारदर्शिता ज़रूरी है, लेकिन चुनावी सुधारों को राजनीतिक हथियार नहीं बनना चाहिए।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत की निर्वाचन प्रणाली की हालिया सराहना ने विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों—भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका—में चुनावी शुचिता पर चल रही बहस को पुनः केंद्र में ला दिया है। ट्रम्प ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए अमेरिकी चुनाव प्रणाली में 'वैध फोटो पहचान पत्र' की अनिवार्यता की वकालत की है।
भारत और अमेरिका की निर्वाचन प्रणालियों के ढाँचे में मौलिक अंतर है:
भारत का केंद्रीयकृत मॉडल: भारत में 'भारतीय निर्वाचन आयोग' एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है, जो पूरे देश में एकीकृत और राष्ट्रीयकृत प्रणाली के तहत चुनाव संपन्न कराता है। यद्यपि इसकी साख और कार्यप्रणाली ने दशकों तक वैश्विक प्रशंसा पाई है, फिर भी हाल के दिनों में इसकी निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक बहसें तेज़ हुई हैं।
अमेरिका का विकेंद्रीकृत मॉडल: अमेरिका में चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह राज्यों और स्थानीय स्तर पर विभाजित है। वहाँ प्रत्येक राज्य के पास अपने नियम तय करने का अधिकार है, जिससे मतदान और पंजीकरण की प्रक्रियाओं में कई विसंगतियाँ रह जाती हैं। हालाँकि, अमेरिकी संविधान कांग्रेस (संसद) को यह अधिकार देता है कि वह कानून बनाकर इन नियमों में बदलाव कर सकती है। इसी दिशा में हाल ही में लाया गया 'सेव एक्ट' मतदाता पंजीकरण के लिए नागरिकता के प्रमाण और फोटो पहचान पत्र को अनिवार्य बनाने का प्रयास कर रहा है।
दोनों ही देशों में इस बात पर पूर्ण सहमति है कि केवल नागरिकों को ही मतदान का अधिकार होना चाहिए और प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। हालाँकि, विवाद तब उत्पन्न होता है जब इन नियमों के क्रियान्वयन में दलीय राजनीति हावी हो जाती है।
उदारवादी/प्रगतिशील बनाम रूढ़िवादी दृष्टिकोण: दोनों देशों में राजनीतिक दल अपने-अपने तरीक़ों से मतदाता सूची को शुद्ध करने की बात करते हैं। सत्ताधारी दल प्रायः चुनावी प्रक्रिया को अत्यधिक लचीला बताते हुए दावा करते हैं कि इससे गैर-नागरिकों या अयोग्य मतदाताओं को वोट देने का अवसर मिल जाता है।
इसके विपरीत, विपक्षी दल आरोप लगाते हैं कि 'चुनावी सुधार' या 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) जैसे अभियानों की आड़ में लक्षित सामाजिक समूहों और वैध मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने का सुनियोजित प्रयास किया जाता है।
भारत में 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) की चुनौती
भारत के संदर्भ में, मतदाता सूची के शुद्धिकरण या 'विशेष गहन पुनरीक्षण' जैसी प्रक्रियाओं को लेकर पारदर्शिता, पर्याप्त परामर्श और पर्याप्त समय का अभाव चिंता का विषय बनता है। क्योंकि यह अभ्यास दशक या दो दशक में एक बार होने वाला एक संवेदनशील कार्य है, इसलिए इसे अत्यंत सावधानी, समावेशिता और जन-विश्वास के साथ किया जाना अनिवार्य है। बिना पूर्ण पारदर्शिता के हड़बड़ी में उठाए गए क़दम लोकतंत्र की नींव को कमज़ोर कर सकते हैं।
किसी भी जीवंत लोकतंत्र का आधार जनता का अपनी चुनाव प्रणाली पर अटूट विश्वास होता है। इसके लिए निम्नलिखित बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
समान नियम और सार्वभौमिक स्वीकार्यता: यह स्वीकार करना आवश्यक है कि केवल वैध नागरिकों की साफ़-सुथरी मतदाता सूची और फोटो पहचान पत्र के साथ मतदान, एक निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं।
दोनों ही देशों में राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि चुनावी सुधारों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों या हाशिए पर मौजूद वर्गों के ख़िलाफ़ एक राजनीतिक हथियार के रूप में न हो।
भारत और अमेरिका, दोनों ही देश लोकतांत्रिक मूल्यों का नेतृत्व कर सकते हैं, लेकिन ऐसा तभी संभव होगा जब वे अपनी-अपनी प्रणालियों में व्याप्त राजनीतिक अविश्वास को दूर कर चुनावी प्रक्रियाओं की शुचिता और साख को पुनर्स्थापित करेंगे। लोकतंत्र केवल मतदान कराने से नहीं, बल्कि इस विश्वास से बचता है कि हर वोट सही है और हर नागरिक का अधिकार सुरक्षित है।
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