जनगणना के समानांतर जलवायु संकट: भविष्य की नीतियों के लिए नया दृष्टिकोण।
जनगणना केवल यह बताने का माध्यम नहीं है कि देश में कुल कितने लोग रहते हैं, बल्कि यह इस बात का भी प्रतिबिंब है कि कोई समाज और शासन अपने नागरिकों को किस नजर से देखता है तथा भविष्य की भावी चुनौतियों का सामना किस प्रकार करना चाहता है। लंबे समय के अंतराल के बाद होने वाली जनगणना में सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों के साथ-साथ अब एक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण आयाम को जोड़ने की तात्कालिक आवश्यकता महसूस की जा रही है—और वह है 'जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय वास्तविकताएं'।
आज भारत जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, वे केवल सामाजिक या आर्थिक तक सीमित नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की कोई काल्पनिक आशंका नहीं, बल्कि एक कठोर और वर्तमान वास्तविकता बन चुका है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसके गंभीर परिणाम प्रत्यक्ष रूप से देखे जा रहे हैं:
पूर्वी भारत में आकाशीय बिजली (वज्रपात) गिरने की बढ़ती घटनाएं।
असम और बिहार में बार-बार आने वाली विनाशकारी बाढ़।
बुंदेलखंड और दक्षिण भारत के क्षेत्रों में गहराता गंभीर जल संकट।
हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन तथा हिमनद झीलों के फटने का खतरा।
पश्चिमी और मध्य भारत में भूजल स्तर का लगातार गिरना।
ये सभी घटनाएं अलग-अलग या अलग-थलग पड़ने वाली पर्यावरणीय समस्याएं नहीं हैं, बल्कि इनका सीधा और व्यापक प्रभाव हमारी खेती-किसानी, रोजगार, स्वास्थ्य, पलायन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
पर्यावरण और जनगणना के इस अंतर-संबंध का एक ऐतिहासिक संदर्भ भी है। वर्ष 1887 में तत्कालीन मारवाड़ राज्य में जनगणना के लिए एक 'ग्राम प्रश्नावली' तैयार की गई थी। उस समय यह प्रश्नावली केवल आबादी या राजस्व का विवरण नहीं मांगती थी, बल्कि इसमें कुओं और तालाबों की संख्या, पानी की गुणवत्ता, मिट्टी के प्रकार, चरागाह, वृक्षों की प्रजातियां, पशुधन, स्थानीय फसलें, कुटीर उद्योग, महामारी, अकाल, पलायन और गांव की सामाजिक संस्थाओं से जुड़े 56 प्रश्न शामिल थे।
यह ऐतिहासिक दस्तावेज इस बात का प्रमाण है कि एक सदी पहले भी नीतियां बनाते समय प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी को उतना ही महत्त्व दिया जाता था जितना कि जनसंख्या को।
वर्तमान दौर में हमारी सूचना व्यवस्था बिखरी हुई है—पानी का आंकड़ा एक विभाग के पास है, भूजल का दूसरे के पास, और जनसंख्या का तीसरे के पास। इसके परिणामस्वरूप, हम यह तो जानते हैं कि किसी क्षेत्र में कितने परिवार रहते हैं, लेकिन यह आंकड़ा और समझ गायब हो जाती है कि घटते भूजल, बदलती जलवायु और सीमित संसाधनों के बीच उन लोगों का जीवन और जीविका किस हद तक प्रभावित हो रही है।
जनगणना और सांख्यिकी को केवल आबादी की गिनती तक सीमित न रखकर उसे प्राकृतिक संसाधनों, जलवायु जोखिमों और स्थानीय पारिस्थितिकी के साथ जोड़ा जाए। प्राकृतिक आपदाओं, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों के क्षरण का किस क्षेत्र और वर्ग पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, इसका सटीक और एकीकृत डेटा एकत्र किया जाए।
डेटा-आधारित शासन के जरिए ऐसी नीतियां बनाई जाएं जो आने वाले जलवायु संकटों और आर्थिक विषमताओं का सामना करने में सक्षम हों।
बदलती प्रकृति और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में हमें एक बार फिर उस बिंदु पर लौटने की जरूरत है, जहां केवल लोगों की गिनती पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह समझना भी उतना ही आवश्यक है कि लोग किन परिस्थितियों और प्राकृतिक संसाधनों के बीच जीवन-यापन कर रहे हैं। जनगणना के साथ जलवायु और पर्यावरणीय वास्तविकताओं का समावेशन ही भारत को एक सुरक्षित, समावेशी और सतत भविष्य की ओर ले जा सकता है।

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