न्यायिक नियुक्तियों में गोपनीयता की संस्कृति का अंत: पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता!
भारतीय न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली लंबे समय से बहस का विषय रही है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की टिप्पणी ने इस चर्चा को पुनर्जीवित कर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा कि कॉलेजियम प्रक्रिया में अधिक खुलापन जनता के विश्वास को मजबूत करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि योग्यता ही प्राथमिक मानदंड बनी रहे। स्वतंत्रता के संरक्षण के नाम पर कॉलेजियम प्रणाली को कार्यकारी हस्तक्षेप से दूर रखा गया था, लेकिन समय के साथ यह संवैधानिक जवाबदेही से ही अलग-थलग पड़ गई। न्यायपालिका खुद एक ऐसी प्रणाली बन गई है जो अन्य सभी सार्वजनिक संस्थानों से पारदर्शिता की मांग करती है, परंतु अपनी ही नियुक्ति प्रक्रिया को बंद दरवाजों के पीछे रखती है।
कॉलेजियम प्रणाली का विकास संविधान के मूल पाठ से नहीं, बल्कि न्यायालय के ही फैसलों (प्रथम, द्वितीय और तृतीय न्यायाधीश मामलों) के माध्यम से हुआ है। हालाँकि शुरुआती मंशा न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करना था, परंतु तीन दशकों के बाद भी यह प्रक्रिया दुनिया के किसी भी प्रमुख संवैधानिक लोकतंत्र की तुलना में सबसे कम पारदर्शी बनी हुई है। रिक्तियों की अग्रिम अधिसूचना, पात्रता मानदंड या उम्मीदवारों के मूल्यांकन की कोई निर्धारित कार्यप्रणाली सार्वजनिक नहीं की जाती। कॉलेजियम प्रणाली के प्रमुख वास्तुकारों में से एक, स्वर्गीय फली नरीमन ने भी बाद में स्वीकार किया था कि यह व्यवस्था बार (वकीलों) के सुझावों के प्रति बिल्कुल संवेदनशील नहीं थी।
कॉलेजियम के निर्णय और उनकी पारदर्शिता के रिकॉर्ड में सुधार होने के बजाय समय के साथ गिरावट आई है। अक्टूबर 2017 में कॉलेजियम ने नियुक्तियों के कारणों को संक्षेप में प्रकाशित करना शुरू किया था, जिसे पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया था। परंतु धीरे-धीरे यह प्रथा समाप्त कर दी गई। नवंबर 2024 के बाद से संकल्पों में यह बताना भी बंद कर दिया गया कि निर्णय में किन सदस्यों ने भाग लिया और इसके पीछे क्या तर्क थे। नवंबर 2025 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि विस्तृत कारणों को प्रकाशित न करने का फैसला इसलिए लिया गया ताकि अस्वीकृत उम्मीदवारों के करियर की संभावनाओं को नुकसान न पहुंचे। यह तर्क विरोधाभासी है, क्योंकि अगर यही तर्क लागू किया जाए तो अदालत में हारने वाले हर याचिकाकर्ता के फैसले को भी गोपनीय रखना पड़ेगा। मीडियावन मामले में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि सीलबंद लिफाफे की गोपनीयता पारदर्शी प्रणाली के विपरीत है, लेकिन वही सिद्धांत न्यायाधीशों की अपनी नियुक्ति प्रक्रिया पर लागू नहीं होता।
पारदर्शिता की कमी का सबसे गंभीर परिणाम 'अंकल जजों' यानी भाई-भतीजावाद और न्यायिक वंशवाद के रूप में सामने आता है। जब पूर्व या वर्तमान न्यायाधीशों के रिश्तेदार आसानी से न्यायाधीश बन जाते हैं, तो बिना किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि वाले योग्य वकीलों का मनोबल गिरता है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढा ने भी स्वीकार किया था कि उच्च न्यायालयों में लगभग हर तीसरा न्यायाधीश किसी न किसी पूर्व न्यायाधीश का संबंधी हो सकता है। 2018 में केंद्र सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा अनुशंसित 33 नामों में से 11 पर इसी आधार पर आपत्ति जताई थी। 2025 के एक अध्ययन के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के लगभग 30 प्रतिशत न्यायाधीशों के पारिवारिक तार पूर्व न्यायाधीशों से जुड़े थे। बिना किसी सार्वजनिक और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया के यह पहचानना असंभव हो जाता है कि किसी रिश्तेदार का चयन उसकी योग्यता के आधार पर हुआ है या पारिवारिक संबंधों के कारण।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 सार्वजनिक रोजगार में समानता और समान अवसर की गारंटी देते हैं। 'उमादेवी मामले' में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियाँ पिछले दरवाजे से नहीं हो सकतीं। जब एक क्लर्क या इंजीनियर की भर्ती में पारदर्शिता आवश्यक है, तो देश के उच्चतम संवैधानिक पदों को इस मानक से बाहर क्यों रखा जाना चाहिए? हालाँकि न्यायिक नियुक्तियाँ केवल एक प्रतियोगी परीक्षा नहीं हो सकतीं, लेकिन प्रक्रिया की संपूर्ण अनुपस्थिति को भी सही नहीं ठहराया जा सकता। 'सुभाष चंद्र अग्रवाल मामले' में अदालत ने स्वयं माना था कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय सूचना के अधिकार (RTI) के तहत आता है, लेकिन इस सिद्धांत को न्यायाधीशों की नियुक्ति पर कभी लागू नहीं किया गया।
अन्य लोकतांत्रिक देशों, जैसे कि यूनाइटेड किंगडम, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा के उदाहरण दर्शाते हैं कि पारदर्शिता और न्यायिक स्वतंत्रता एक साथ अस्तित्व में रह सकते हैं। यूके में 'न्यायिक नियुक्ति आयोग' रिक्तियों का विज्ञापन देता है, साक्षात्कार आयोजित करता है और स्पष्ट मानदंड अपनाता है। दक्षिण अफ्रीका में उम्मीदवारों का साक्षात्कार सार्वजनिक रूप से लिया जाता है। इन देशों में पारदर्शिता से न्यायिक स्वतंत्रता कमजोर नहीं हुई, बल्कि नागरिकों का विश्वास और मजबूत हुआ है।
वर्तमान डिजिटल युग में जहाँ हर निर्णय पर त्वरित जन-समीक्षा होती है, न्यायपालिका अपनी अवमानना शक्ति के बल पर आलोचनाओं को दबा नहीं सकती। सुधार का अर्थ कॉलेजियम प्रणाली को खत्म करना नहीं, बल्कि इसे आधुनिक और पारदर्शी बनाना है। कॉलेजियम को अग्रिम रिक्तियों की सूचना प्रकाशित करनी चाहिए, आवेदन आमंत्रित करने चाहिए, वस्तुनिष्ठ पात्रता मानदंड तय करने चाहिए और चयन के कारणों को रिकॉर्ड करना चाहिए। गोपनीयता और पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। यह लड़ाई न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका की नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या एक संवैधानिक मूल्य (न्यायिक स्वतंत्रता) दूसरे संवैधानिक मूल्य (पारदर्शिता और समानता) को पूरी तरह से दबा सकता है। यदि कॉलेजियम इस बात को स्वीकार नहीं करता कि बिना जवाबदेही के स्वतंत्रता अविश्वास पैदा करती है, तो संस्थान की साख का क्षरण होना तय है।
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