संस्थागत नाकामी और रैगिंग का भयावह सच!
सूरत के सरकारी मेडिकल कॉलेज में एक प्रथम वर्ष के रेजिडेंट डॉक्टर की रैगिंग के कारण हुई आत्महत्या की घटना सिर्फ एक छात्र की मौत नहीं, बल्कि हमारी शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था के पूरी तरह खोखले हो चुके रवैये का नग्न प्रदर्शन है। जब किसी प्रतिष्ठित संस्थान में "परिचय" के नाम पर मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न इस हद तक बढ़ जाए कि एक होनहार युवा को अपनी जीवनलीला समाप्त करनी पड़े, तो यह स्पष्ट तौर पर आपराधिक लापरवाही और सामंती मानसिकता की विजय है।
कॉलेज प्रशासन का रवैया पूरी तरह निराशाजनक और गैर-जिम्मेदाराना है। छात्र के आत्महत्या जैसा घातक कदम उठाने के बाद चार आरोपियों को केवल छह महीने के लिए निलंबित करना और हॉस्टल खाली कराना एक खोखली औपचारिकता से अधिक कुछ नहीं है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन की नींद हमेशा किसी मासूम की बलि चढ़ने के बाद ही खुलेगी? जिस निरोधात्मक और सतर्क रवैये की आवश्यकता परिसर को भयमुक्त बनाने के लिए नियमित रूप से होनी चाहिए, वह केवल हादसों के बाद खानापूर्ति तक ही सीमित क्यों रह जाती है?
सर्वोच्च न्यायालय के सख्त निर्देशों और रैगिंग विरोधी कड़े कानूनों के बावजूद उच्च शिक्षण संस्थानों में इस तरह की अमानवीय प्रवृत्ति का फलना-फूलना यह साबित करता है कि वरिष्ठ छात्रों के भीतर "श्रेष्ठता-ग्रंथि" (Superiority Complex) और अहंकार किस कदर हावी है। परिचय के नाम पर नए विद्यार्थियों का अपमान, उत्पीड़न और मानसिक शोषण करके विकृत खुशी पाना मानसिक रूप से बीमार मानसिकता का प्रतीक है।
जब तक संस्थानों में जवाबदेही तय नहीं होगी और दोषी वरिष्ठों के साथ-साथ मूकदर्शक बने रहने वाले प्रशासन पर भी सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक यह जानलेवा सिलसिला रुकने वाला नहीं है। रैगिंग कोई परंपरा या साधारण छेड़छाड़ नहीं, बल्कि एक गंभीर अपराध है, और इसे इसी कड़ाई के साथ कुचला जाना चाहिए।

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