राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में सुधार — 'खाद्य उपलब्धता' से 'पोषण सुरक्षा' की ओर।
भारत में खाद्य सुरक्षा की बहस एक नए और निर्णायक दौर में पहुँच चुकी है। भारतीय राष्ट्रीय पोषण संस्थान और हालिया उपभोग सर्वेक्षणों के आंकड़ों के अनुसार, पर्याप्त स्वस्थ आहार न जुटा पाने वाले परिवारों का अनुपात वर्ष 2011-12 के 52% से घटकर 2023-24 में लगभग 25% (ग्रामीण 25%, शहरी 21%) पर आ गया है।
हालाँकि यह एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन आज भी देश की एक-चौथाई आबादी पौष्टिक भोजन से वंचित है। आधुनिक नीति निर्माण में यह स्वीकार करना आवश्यक है कि गरीबी, भुखमरी और पौष्टिक आहार की अनुपलब्धता तीन अलग-अलग चुनौतियाँ हैं। 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा (संशोधन) विधेयक, 2026' का उद्देश्य मौजूदा राशन व्यवस्था को नुकसान पहुँचाए बिना 'पोषण सुरक्षा' की ओर बढ़ना होना चाहिए।
वर्तमान में प्राथमिकता वाले परिवारों को 5 किग्रा प्रति व्यक्ति, जबकि अंत्योदय अन्न योजना के अति-संवेदनशील परिवारों को परिवार के आकार से परे 35 किग्रा प्रति परिवार एकमुश्त अनाज मिलता है।
विधेयक में AAY राशन को प्रति व्यक्ति 7 किग्रा (अधिकतम 35 किग्रा प्रति परिवार) निर्धारित करने का प्रस्ताव है।
इससे 1 से 4 सदस्यों वाले छोटे AAY परिवारों का राशन आवंटन 20% से 80% तक घट सकता है। उदाहरण स्वरूप, तमिलनाडु में 84.5% AAY परिवार ऐसे हैं जिनमें 5 से कम सदस्य हैं। प्रस्तावित नियम लागू होने से राज्य का AAY अनाज आवंटन 35.6% तक कम हो जाएगा।
छोटे परिवारों में बहुधा बुजुर्ग, विधवाएँ या दिव्यांग व्यक्ति होते हैं। अतः नीति में 35 किग्रा की न्यूनतम सीमा (नो-लॉस गारंटी) को बनाए रखना बेहद जरूरी है।
NFSA का लाभार्थी दायरा अभी भी 2011 की जनगणना (81.35 करोड़ सीमा) पर आधारित है, जिससे 2025 की आबादी के अनुसार केवल 55.6% लोग ही कवर हो पा रहे हैं। 2027 की जनगणना के बाद इस सीमा को तुरंत अपडेट किया जाना चाहिए।
अनाज बढ़ा देने मात्र से स्वास्थ्य नहीं सुधरता। भारत आज 'कुपोषण के दोहरे बोझ' से जूझ रहा है:
NFHS-6 के अनुसार, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में नाटापन घटकर 29.3% हुआ है, लेकिन दुबलापन और कम वजन की समस्या अब भी गंभीर है। केवल 15% छोटे बच्चों को ही न्यूनतम पर्याप्त आहार मिल पाता है।
ICMR-INDIAB अध्ययन के अनुसार भारत में 10.1 करोड़ लोग मधुमेह (Diabetes) और 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज से पीड़ित हैं। भारतीयों की दैनिक ऊर्जा का 62.3% हिस्सा कार्बोहाइड्रेट से आता है, जबकि प्रोटीन केवल 12% है। केवल सफेद चावल और गेहूँ पर अत्यधिक निर्भरता मधुमेह के जोखिम को बढ़ाती है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली में केवल रिफाइंड अनाज बांटने के बजाय दालें, मोटे अनाज (मिलेट्स), दूध, फल और सब्जियाँ शामिल की जानी चाहिए।
खाद्य सब्सिडी में से कटौती करके नहीं, बल्कि पृथक बजटीय प्रावधानों (केंद्रीय बजट 2026-27 में खाद्य सब्सिडी हेतु ₹2,27,629 करोड़ का प्रावधान) के जरिए दालों और बाजरा/ज्वार की आपूर्ति को बढ़ावा दिया जाए।
आँगनवाड़ी और 'पीएम पोषण' के माध्यम से बच्चों, गर्भवती व धात्री महिलाओं को दूध, अंडे व स्थानीय पौष्टिक आहार उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
देश की 5.50 लाख राशन दुकानों (जो ePoS मशीनों से लैस हैं) का उपयोग पोषण परामर्श और स्वास्थ्य सेवा रेफरल के लिए किया जा सकता है:
राशन पर्चियों व मैसेज के माध्यम से साबुत अनाज, कम नमक, कम चीनी व कम तेल के प्रयोग के लिए जागरूकता बढ़ाना।
ग्राहकों को निकटतम आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (1.86 लाख+ प्राथमिक केंद्र) में मधुमेह और हाई बीपी की निःशुल्क जाँच कराने के लिए प्रेरित करना।
खाद्य सुरक्षा अधिनियम के पुनर्मूल्यांकन की सफलता का मापदंड केवल इस बात से नहीं तय होना चाहिए कि कितना टन अनाज बाँटा गया, बल्कि इससे तय होना चाहिए कि देश के सबसे गरीब और कमजोर परिवार कितना पौष्टिक आहार, गरिमापूर्ण तरीके से प्राप्त कर पा रहे हैं।

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