भारत में युवा संकट: परीक्षा सुधार नहीं, रोज़गार का अभाव असली चुनौती!

 




भारत का वर्तमान युवा संकट केवल परीक्षा सुधारों या प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मुख्य कारण अर्थव्यवस्था में गुणवत्तापूर्ण रोज़गार और अवसरों की भारी कमी है।

 निजी कोचिंग का खर्च भारतीय परिवारों के शिक्षा बजट का 16% तक पहुंच गया है (जो 2018 में 12.5% था)। उच्च माध्यमिक स्तर पर यह खर्च बजट के लगभग एक-चौथाई हिस्से के बराबर है।

22 लाख से अधिक अभ्यर्थी लगभग 1.4 लाख मेडिकल सीटों के लिए परीक्षा में बैठते हैं, जिनमें से शीर्ष 50 कॉलेजों में 10,000 से भी कम सीटें हैं। यही स्थिति इंजीनियरिंग (JEE) जैसी परीक्षाओं की भी है।

 ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) के अनुसार, 2011 के बाद पहली बार 2023-24 में स्नातक (UG) नामांकन में 93,322 की कमी दर्ज की गई, जिसमें उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी गिरावट (1.53 लाख) देखी गई।

पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 के आंकड़ों के अनुसार, 15 से 29 वर्ष की आयु के प्रति 100 स्नातकों में से केवल 26 के पास नियमित वेतन वाली नौकरी है, और मात्र 4 के पास अनुबंध व सामाजिक सुरक्षा युक्त नौकरी है।

6%-6.5% की जीडीपी वृद्धि के दावों के बावजूद विनिर्माण क्षेत्र ग्रॉस वैल्यू ऐडेड (GVA) के केवल 1/6 भाग पर ठहरा हुआ है, जो रोज़गार सृजन के लक्षित 25% के वादे से काफी दूर है।

कॉर्पोरेट टैक्स 30% से घटाकर 22% करने के बावजूद 2007-08 में जीडीपी का 17.3% रहा कॉर्पोरेट निवेश घटकर 2024-25 में 10.3% पर आ गया है।

केवल मुफ्त कोचिंग देना समस्या का समाधान नहीं है। सरकार को औद्योगिक क्षमता में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना होगा, निर्यात-आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन देना होगा, और सख्त नियामक दबावों को कम करके मध्यम आकार के उद्योगों को बढ़ावा देना होगा, ताकि वियतनाम जैसे देशों की तर्ज पर बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा किए जा सकें।












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