सुशासन का खोखला दावा: जहाँ CCTV की निगरानी में भी खौफ के साए में है नारियां।

 




सरकार के उन दावों की हवा अब पूरी तरह निकल चुकी है, जिनमें यह ढिंढोरा पीटा जाता था कि 'पहले लड़कियाँ सूरज ढलने के बाद घर से बाहर नहीं निकलती थीं, लेकिन अब माहौल सुरक्षित है।' जमीनी हकीकत यह है कि आज बेटियाँ न सड़कों पर सुरक्षित हैं और न ही किसी दुकान या घर के भीतर छुपकर अपनी जान बचा पा रही हैं।

अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब वे दिन-दिहाड़े बीच सड़क पर फायरिंग कर रहे हैं और पनाह मांगती सहमी हुई लड़कियों को दुकानों से खींच-खींचकर गोलियाँ मार रहे हैं। यह नजारा किसी दूर-दराज के गांव या सुदूर इलाके का नहीं, बल्कि राज्य की राजधानी का है—जहाँ हर कदम पर पुलिस गश्त और CCTV कैमरों की मौजूदगी का दावा किया जाता है।

सबसे शर्मनाक और चिंताजनक बात यह है कि इस खौफनाक मंजर के दौरान समाज और प्रशासन महाभारत के 'द्रौपदी चीर-हरण' के समय खड़े लोगों की तरह महज मूकदर्शक बने हुए हैं। जब रक्षक ही बेबस हो जाएँ और जनता तमाशबीन बनी रहे, तो कानून-व्यवस्था की इससे बड़ी नाकामी और क्या हो सकती है?

सीसीटीवी कैमरों की निगरानी और पुलिसिया गश्त सिर्फ फाइलों और कागजों तक सीमित रह गई है। अगर राजधानी के मुख्य इलाकों में सरेआम बेटियों को गोलियों का निशाना बनाया जा रहा है, तो यह स्पष्ट है कि अपराधियों के दिल से कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है और तथाकथित 'सुरक्षा' का दावा सिर्फ एक छलावा साबित हो रहा है।

Comments

Popular posts from this blog

अलविदा! एक जन-नेता का सफर हुआ पूरा: प्रोफेसर वसीमुल हक़ 'मुन्ना नेता' नहीं रहे !

केवी स्कूल की छात्रा रास्ते से रहस्यमय परिस्थितियों में गायब, रेलवे ट्रैक के पास झाड़ियों में मिले कपड़े और बस्ता! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

नेउरा-दनियावाँ रेल खंड: क्या बाबूचक-मोहम्मदपुर में बनेगा 'शहीद जयगोविंद सिंह यादव रेलवे स्टेशन'?