बुनियादी ढांचे की खामियां और जवाबदेही: क्या विकसित भारत का सपना सिर्फ GDP तक सीमित है?
भारतीय रेलवे में पानी का संकट।
भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (Infra) और बुनियादी सुविधाओं की एक कड़वी सच्चाई पेश करती है। यह रिपोर्ट सिर्फ सरकारी योजनाओं या कागजी आंकड़ों की बात नहीं करती, बल्कि आम नागरिक के दैनिक जीवन से जुड़ी उन गंभीर समस्याओं पर प्रकाश डालती है जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
भारतीय रेलवे में पानी का संकट: एक गंभीर लापरवाही
CAG की रिपोर्ट के अनुसार, कई प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर पीने के पानी के नमूनों में E. coli और कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए हैं, जो दूषित पानी और सीवेज के रिसाव को दर्शाते हैं।
आधे से अधिक नमूनों में अवशिष्ट क्लोरीन के मानक पूरे नहीं पाए गए।
कई स्टेशनों पर नियमित रूप से होने वाली जीवाणु जांच को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया।
सीवेज पाइपलाइनों का फटना, पानी की टंकियों की महीनों तक सफाई न होना और फिल्टरेशन सिस्टम का सही से काम न करना इसके मुख्य कारण हैं।
यह महज एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि बुनियादी देखरेख और प्रशासनिक जवाबदेही की भारी नाकामी है।
समस्या केवल रेलवे तक सीमित नहीं है। हाल ही में दक्षिण दिल्ली के साकेत में एक 5-मंजिला इमारत गिर गई। पुलिस की चार्जशीट के मुताबिक, इस हादसे की मुख्य वजह अवैध निर्माण और घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल था।
ये घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या हम वास्तव में एक सुरक्षित और आधुनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहे हैं, या सिर्फ बिना नींव के ढांचे खड़े कर रहे हैं?
विकास के दावों और धरातल की हकीकत में अंतर
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का जश्न मना रहा है, लेकिन अगर एक आम नागरिक किसी स्टेशन पर बिना बीमारी के डर के पानी नहीं पी सकता, या किसी इमारत में सुरक्षा के अहसास के साथ कदम नहीं रख सकता, तो बढ़ती GDP का आम आदमी के लिए क्या अर्थ रह जाता है?
विकसित भारत का लक्ष्य केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए भ्रष्टाचार-मुक्त क्रियान्वयन और सख्त जवाबदेही अनिवार्य है।
ऐसा नहीं है कि भारत में विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा तैयार नहीं किया जा सकता। ओडिशा के 'ड्रिंक फ्रॉम टैप' मिशन ने यह साबित किया है कि सही नीयत और प्रबंधन से पुरी और भुवनेश्वर जैसे शहरों में 24×7 साफ और सुरक्षित नल का पानी उपलब्ध कराया जा सकता है।
लेकिन यह सफलता कुछ जगहों तक ही सीमित रह गई है, जिसे अपवाद नहीं बल्कि नियम बनना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों की 2030 की समय सीमा नजदीक आ रही है। जब SDG 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता) और SDG 11 (टिकाऊ शहर और समुदाय) के मानकों पर भारत का मूल्यांकन होगा, तब धरातल की इन कमियों को छिपाना नामुमकिन होगा।
अब समय आ गया है कि CAG की चेतावनियों को गंभीरता से लिया जाए और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

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