Spendonomics -: भारत में उपभोग क्रांति और बढ़ती क्रय शक्ति का नया दौर। -प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र विभाग।

 





NielsenIQ-World Data Lab की नई रिपोर्ट के अनुसार, अगले 10 वर्षों में (वर्ष 2036 तक) भारत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी 'समृद्ध' उपभोक्ता आबादी वाला देश बन सकता है। यद्यपि इस सूची में अमेरिका शीर्ष पर बना रहेगा, लेकिन भारत अपनी तीव्र आर्थिक वृद्धि दर और उच्च क्रय शक्ति के बल पर चीन को पीछे छोड़ देगा।


यद्यपि चीन की नामांक जीडीपी भारत की तुलना में लगभग 5 गुना अधिक है, लेकिन भारत में जीवन-यापन की लागत (वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें) काफी कम है।

अमेरिका में प्रतिदिन $90 खर्च करने वाले व्यक्ति को 'समृद्ध' माना जाता है। भारत में क्रय शक्ति समानता के आधार पर प्रतिदिन ₹1,800 (या ₹54,000 प्रति माह) का खर्च अमेरिकी $90 के बराबर माना गया है।

 अनुमान है कि 2036 तक भारत में लगभग 10.8 करोड़ लोग नियमित रूप से इतना खर्च करने में सक्षम होंगे, जबकि चीन में ऐसे लोगों की संख्या 10.3 करोड़ रहेगी।

मांग में उछाल: मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग की आय बढ़ने से हवाई यात्रा , होटल, लग्जरी गाड़ियां, टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएं और रेस्तरां में खान-पान की बिक्री में भारी बढ़ोतरी होगी।

निजी उपभोग भारतीय जीडीपी का सबसे बड़ा चालक  है। उपभोग में इस वृद्धि से भारत की औसत वार्षिक आर्थिक विकास दर पिछले वर्षों के 7% के आंकड़े को भी पार कर सकती है।

गोल्डमैन सैक्स (2024) के अध्ययन ने भी अनुमान लगाया था कि 2027 तक भारत में समृद्ध उपभोक्ताओं की संख्या 10 करोड़ तक पहुंच जाएगी (जहाँ आय ₹9.5 लाख/वर्ष या खर्च ₹6.6 लाख/वर्ष माना गया था)।

यह वर्ग 2019 से 2023 के दौरान 12-13% वार्षिक दर से बढ़ा है और 2023 तक 6 करोड़ को पार कर चुका था। इस दृष्टि से Nielsen-WDL का 10.8 करोड़ का अनुमान अत्यंत यथार्थवादी और संतुलित प्रतीत होता है।

 भारतीय घरेलू कंपनियों को अभी से प्रीमियम उत्पादों और सेवाओं के निर्माण पर ध्यान देना होगा। यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां (MNCs) इस अवसर का पूरा लाभ उठा लेंगी।

 अगले 10 वर्षों में वैश्विक स्तर पर समृद्ध वर्ग में 37 करोड़ नए उपभोक्ता जुड़ेंगे। यह भारतीय ब्रांडों के लिए वैश्विक विस्तार का एक बड़ा अवसर है।

ब्रांड वैल्यू और R&D: चीन की तरह केवल "दुनिया की फैक्ट्री" बनना ही काफी नहीं है, बल्कि जापान, अमेरिका और जर्मनी की तरह ब्रांड साख बनानी होगी। इसके लिए केवल पूंजीगत व्यय ही नहीं, बल्कि अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर बड़ा निवेश करना अनिवार्य है।

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