मेरी यात्रा: अनुभव का अर्घ्य! -प्रो प्रसिद्ध कुमार.
19 मार्च की वह ढलती सुबह, रविवार का वह प्रहर,
जब धरा पर मैंने रखा कदम, शुरू हुआ यह सफर।
सन सड़सठ (1967) से अब तक का, यह लंबा अंतराल,
छठे दशक के अंतिम सोपान पर, खड़ा आज खुशहाल।
फुर्सत की कोई चाह नहीं, काम ही विश्राम बना,
जिम्मेवारी की धूप में, व्यक्तित्व का आयाम बना।
अर्थ बिना अनर्थ है माना, पर ज़मीर न डोल सका,
सौदेबाजी की मंडी में, खुद को कभी न तोल सका।
कौड़ी-कौड़ी जोड़कर, जिसने बुना समाज।
नीति तजी न लाभ हित, वही आज सिरताज॥
जीवन की 'रिप्ले' चली, तो दृश्य सभी जीवंत हुए,
कड़वे अनुभव पीछे छूटे, मीठे पल अनंत हुए।
मूर्खों की संगति त्यागी मैंने, जहाँ न कोई मान था,
असफलता की राहें बदलीं, यही प्रज्ञा-ज्ञान था।
कनिष्ठ से ज्येष्ठ हुए, बदली रिश्तों की परिभाषा,
स्वार्थ भरा यह जग सारा, पर निस्वार्थ रही अभिलाषा।
चुम्बकीय है वह व्यक्तित्व, जो औरों को अपना ले,
खोट वहीं है निश्चित ही, जो अपनों को बिसरा दे।
अहम तजो रे बावरे, नश्वर है यह देह।
जग में केवल शेष है, करुणा, सत्य और नेह॥
समय अनमोल है इतना, जिसे कोई न खरीद सके,
नफरत और द्वेष की खातिर, क्यों कोई मन को डसे?
शिक्षा और सदाचार ही, जीवन के असली गहने हैं,
ज्ञान की अलख जगाए रखना, सुखी अगर रहना है।
बधाई देने वाले अपनों का, हृदय से आभार करूँ,
परहित और परोपकार को, जीवन का आधार करूँ।
साठवें वर्ष की इस दहलीज़ पर, यही संकल्प उठाता हूँ,
सत्यनिष्ठ और आत्मनिर्भर, बन अपनी राह बनाता हूँ।


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