कर्ज लेकर घी पीने की सियासत और बिहार का खाली खजाना: 2025 के बाद की आर्थिक हकीकत। _प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र विभाग।
जब तक जिएं, सुख से जिएं, कर्ज लेकर भी घी पिएं।
बिहार की राजनीति में जुमलों और लोकलुभावन वादों का इतिहास पुराना है, लेकिन जब बात राज्य की तिजोरी और वित्तीय अनुशासन की आती है, तो तस्वीर बेहद चिंताजनक नजर आती है। साल 2025 के विधानसभा चुनाव में सत्ता की चाबी एक बार फिर एनडीए (NDA) के हाथों में आ गई। जनता ने सरकार पर भरोसा जताया, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वापसी आर्थिक मोर्चे पर स्थिरता की गारंटी दे पाई है? हालिया आंकड़े और CRISIL जैसी एजेंसियों की रिपोर्ट्स इस बात की गवाही देती हैं कि राजनीतिक जीत के बावजूद वर्तमान सरकार खजाने के मामले में फिसड्डी साबित हो रही है।
'ऋण लेकर घी पीने' वाली प्रवृत्ति और बढ़ता राजकोषीय घाटा
भारतीय संस्कृति में कहावत है— "यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्" ।बिहार के मौजूदा वित्तीय प्रबंधन पर यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। चुनाव जीतने और मतदाताओं को लुभाने के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर अंधाधुंध खर्च किया गया, जिसके लिए भारी-भरकम कर्ज का सहारा लेना पड़ा।
परिणामस्वरूप, वित्तीय वर्ष 2025-26 में बिहार का राजकोषीय घाटा बढ़कर 5.82% तक पहुंच गया है। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, राजकोषीय घाटा 3% से अधिक होना राज्य की कमजोर वित्तीय सेहत का स्पष्ट प्रमाण है। 17 बड़े राज्यों में बिहार का इस तरह सबसे अधिक वित्तीय दबाव में रहना यह बताता है कि विकास कार्यों से ज्यादा राजनीतिक पैंतरेबाज़ी पर जोर दिया जा रहा है।
चुनावी साल और वित्तीय अनियंत्रण का चक्र
यह कोई पहला मौका नहीं है जब बिहार के खजाने पर चुनाव का भारी बोझ पड़ा हो। जब दो दशक पहले (2005 में) नीतीश कुमार सत्ता में आए थे, तब भी उन्होंने राजद (RJD) शासनकाल पर श्वेत-पत्र जारी कर खजाना खाली होने की बात कही थी। इसके बाद कुछ वर्षों तक वित्तीय अनुशासन की मिसाल भी कायम की गई, लेकिन चुनावी वैतरणी पार करने की होड़ में वे पुराने रास्ते पर लौटने को मजबूर हो गए। कोरोना काल के बाद से जिस तरह से वित्तीय अनुशासन को ताक पर रखकर घोषणाएं की गईं, उसने राज्य को फिर से उसी दौर में धकेल दिया है जहां जीएसडीपी की तुलना में कर्ज का बोझ खतरनाक स्तर तक बढ़ रहा है।
विकास के दावे और जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर बिहार के युवाओं और भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा है। सिर्फ मुफ्त की योजनाओं या लोकलुभावन वादों से सत्ता तो हासिल की जा सकती है, लेकिन एक आत्मनिर्भर और मजबूत अर्थव्यवस्था का निर्माण नहीं किया जा सकता। यदि सरकार ने समय रहते अपने खर्चों पर नियंत्रण नहीं किया और राजस्व बढ़ाने के ठोस उपाय नहीं ढूंढे, तो आने वाली पीढ़ियों पर कर्ज का पहाड़ और गहरा होता चला जाएगा।
सत्ता में वापसी जश्न का विषय हो सकता है, लेकिन खाली खजाने के साथ जनता के विकास के दावों की पोल खुलना यह तय करता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और वित्तीय ईमानदारी के बीच तालमेल बिठाए बिना बिहार का भला नहीं हो सकता।
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