सत्ता के गलियारे, विज्ञापनों का सच और 'शेष कुशल है' की कड़वी हकीकत!

 




मंत्री हैं अब राजा-रानी,

असली राजा भरता पानी।

संसद के भीतर जंगल है,

शेष कुशल है।

परिवर्तन नारों में है,

उपलब्धि अखबारों में है।

नालों में ही गंगाजल है,

शेष कुशल है।

न्याय बिके अब बाजारों में,

सच्चाई दुबकी कारों में।

हर तरफ केवल हड़कंप है,

शेष कुशल है।

-प्रसिद्ध व्यंग्यकार और कवि अशोक चक्रधर । 

 

यह पंक्तियाँ भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान तस्वीर पर एक धारदार व्यंग्य हैं। यह कविता उस बड़े अंतर को रेखांकित करती है जो सरकार के दावों (विज्ञापनों) और धरातल की कड़वी सच्चाई के बीच मौजूद है।

संविधान के अनुसार जनता ही लोकतंत्र में 'राजा' है, लेकिन आज आम नागरिक बुनियादी सुविधाओं—पानी, स्वास्थ्य, रोजगार—के लिए तरस रहा है। वहीं, जनप्रतिनिधि या 'मंत्री' सामंती राजा-रानी की तरह विशेषाधिकारों का आनंद ले रहे हैं।

संसद, जो जन-समस्याओं के समाधान का मंदिर थी, आज शोर-शराबे, हंगामे और गिरते राजनीतिक विमर्श का अखाड़ा बन चुकी है।

 राजनीति केवल लुभावने नारों और अखबारों के बड़े-बड़े विज्ञापनों तक सीमित हो गई है। कागजों और मीडिया कवरेज में तो नदियाँ साफ हो रही हैं और विकास की नदियाँ बह रही हैं, लेकिन धरातल पर प्रदूषण, प्रशासनिक ढिलाई और भ्रष्टाचार जस का तस है—मानो 'नालों में ही गंगाजल' बह रहा हो।

'शेष कुशल है' शब्द उस लाचारी और तंज का प्रतीक है, जहाँ आम आदमी सब कुछ देखते और सहते हुए भी अंत में यही कहने पर मजबूर है कि सब ठीक-ठाक है। यह कविता राजनीति के उस चेहरे को बेनकाब करती है जहाँ प्रचार ही तंत्र बन चुका है।












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