युवा आंदोलनों को राहत और न्याय के दोहरे मानदंड ।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए परीक्षा सुधार और सरकारी जवाबदेही की मांग कर रहे युवाओं पर दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करना एक सराहनीय कदम है। केंद्र सरकार के अनुरोध पर लिया गया यह निर्णय उन युवाओं को राहत देता है जिन्होंने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के बैनर तले देशभर में विरोध प्रदर्शन किया था।
आंदोलन की पृष्ठभूमि और प्रभाव
यह आंदोलन पूर्व मुख्य न्यायाधीश के "बेरोजगारी" और "कॉकरोच" संबंधी बयानों के विरोध में शुरू हुआ था। देखते ही देखते यह इतना व्यापक हो गया कि तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। युवाओं की मुख्य मांगों में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज प्राथमिकी (FIR) वापस लेना शामिल था, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार करते हुए केंद्र को भविष्य में नई FIR दर्ज न करने का निर्देश दिया। केंद्र सरकार की यह पहल यह दर्शाती है कि युवाओं के मुद्दे—विशेष रूप से पेपर लीक की बार-बार होने वाली घटनाएं और बेरोजगारी की समस्या—कितने गंभीर थे।
असंतोष के प्रति दोहरा रवैया
यद्यपि युवाओं के मामले में सरकार का रुख सकारात्मक रहा, लेकिन यह अन्य जन आंदोलनों (जैसे किसान आंदोलन या नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ प्रदर्शन) के प्रति अपनाए गए रुख के बिल्कुल विपरीत है। उन मामलों में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर भी देशद्रोह और आतंकवाद जैसे गंभीर आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया था। सरकारें प्रायः असंतोष को दबाने और आपराधिक रूप देने का प्रयास करती रही हैं।
सीजेपी आंदोलन की विशिष्टता और भविष्य की राह
CJP आंदोलन इसलिए सफल रहा क्योंकि इसने धर्म, जाति और वर्ग से परे जाकर केवल छात्र और युवा पहचान को आगे रखा, जिससे फूट डालने वाले हथकंडे विफल हो गए।
यदि सर्वोच्च न्यायालय यही मानक अन्य आंदोलनों के प्रदर्शनकारियों पर भी लागू करता है, तभी न्याय की सही स्थापना होगी। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक यह राहत एक सार्वभौमिक सिद्धांत बनने के बजाय केवल एक अपवाद ही बनी रहेगी।
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